महात्मा ईशरदास जी का जीवन परिचय

प्रस्तावना

देवियांण के रचयिता महात्मा ईसरदास एक कृष्णभक्त चारण परिवार में जन्मे थे। उनका जन्म सं. 1595 में मरुधरा राजस्थान के भाद्रेस गाँव में हुआ था। यह गाँव अब बाड़मेर जिले में है। बचपन में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया। ईसरदास माता-पिता के बिना विषादग्रस्त रहने लगे तो चाचा आसानन्द उन्हें कुलदेवी सूँधा माता की शरण में ले गये। कुलदेवी की कृपा से उनका विषाद मिट गया। इसके बाद चाचा ने उन्हें द्वारका ले जाकर श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के दर्शन कराए। ईसरदास रुक्मिणी और श्रीकृष्ण को माता-पिता मानकर उनकी भक्ति में तल्लीन रहने लगे। उनमें उच्चकोटि की काव्यप्रतिभा स्फुरित हो गई। उनकी काव्यप्रतिभा से प्रसन्न होकर गुजरात के एक राजा ने उन्हें अपना राजकवि बना लिया। ईसरदास ने कृष्णभक्ति के काव्य हरिरस की रचना करके द्वारका जाकर श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के सामने उसे पढ़कर सुनाया। रुक्मिणी माता ने प्रसन्न होकर उन्हें देवीभक्तिपरक काव्य की रचना के लिए प्रेरित किया।

ईसरदास माता के आत्मीय अनुरोध से भावविभोर हो गए। उन्होंने राजकवि के पद तथा गृहस्थाश्रम दोनों का त्याग कर दिया। वे अपने गाँव भाद्रेस आकर लूणी नदी के तट पर कुटिया बनाकर देवी की साधना करने लगे। साधना से प्राप्त अनुभूति और तत्त्वज्ञान को उन्होंने देवियांण नाम से शब्दों में ढाला तथा माता रुक्मिणी को सुनाने द्वारका पहुँच गए। रुक्मिणी माता ने काव्य को सुनकर आशीर्वाद देते हुए कहा- ‘‘ईसरदास! यह ‘देवियां’ चण्डीपाठ के समान भक्तों को फलदायिनी होगी। ’’

महात्मा ईसरदास के जीवन की अनेक चमत्कारी घटनाओं के उल्लेख मिलते हैं। एक गरीब ग्वाला सांगा गौड़ वेणु नदी के तीव्र प्रवाह में बह गया था। महात्मा ईसरदास की चमत्कारी शक्ति से वह जीवित लौट आया। इसी प्रकार उन्होंने अमरेली के बीजा के युवा पुत्र करण को प्राणदान दिया। एक बार उन्हें द्वारकाधाम में श्री रणछोड़राय के मंदिर में दर्शनार्थ पहुँचने में विलम्ब हो गया। मन्दिर के पट बन्द देखकर उन्होंने श्रीरणछोड़राय से दर्शन देने का अनुरोध किया। मन्दिर के कपाट स्वतः खुल गए।

महात्मा ईशरदास जी का जीवन परिचय

संवत पन्नर पनरमें, जनम्या ईशर दास चारण वरण चकोर में, उण दिन भयो उजास।। सर भुव सर शशि बीज भ्रगु, श्रावण सित पख वार। समय प्रात सूरा घरे ईशर भो अवतार। भक्त कवि ईसरदास की मान्यता राजस्थान एवं गुजरात में एक महान संत के रूप में रही है | संत महात्मा कवि ईसरदास का जन्म बाडमेर राजस्थान के भादरेस गाँव में वि. सं. 1515 में हुआ था। पिता सुराजी रोहड़िया शाखा के चारण थे एवं भगवान् श्री कृष्णके परम उपासक थे। जन मानस में भक्त कवि ईसरदास का नाम बडी श्रद्घा और आस्था से लिया जाता है। इनके जन्मस्थल भादरेस में भव्य मन्दिर इसका प्रमाण हैं, जहॉ प्रति वर्ष बडा मेला लगता हैं। ईसरदास प्रणीत भक्ति रचनाओं में हरिरस , बाल लीला, छोटा हरिरस, गुण भागवतहंस, देवियाण , रास कैला, सभा पर्व, गरूड पुराण, गुण आगम, दाण लीला प्रमुख हैं। हरिरस ग्रन्थ को तो अनूठे रसायन की संज्ञा दी गई हैं। सरब रसायन में सरस, हरिरस सभी ना कोय। हेक घडी घर में रहे,सह घर कंचन होय॥ हरिरस ग्रन्थ को सब रसों का सिरमौर बताया बताया गया हैं। हरिरस हरिरस हैक हैं,अनरस अनरस आंण। विण हरिरस हरि भगति विण,जनम वृथा कर जाण॥ हरिरस एकोपासना का दिव्य आदर प्रस्तुत करने वाला ग्रन्थ हैं जिसमें सगुण और निर्गुण भक्ति के समन्वय का, भक्ति के क्षैत्र में उत्पन्न वैशम्य को मिटानें का स्तुत्य प्रयास किया गया हैं। हरि हरि करंता हरख कर,अरे जीव अणबूझ। पारय लाधो ओ प्रगट, तन मानव में तूझ॥ नारायण ना विसरिये, नित प्रत लीजै नांम। जे साधो मिनखां जनम, करियै उत्तम काम॥ ईसरदास के समकालीन (मध्यकालीन) साहित्य में वीर, भक्ति और श्रृंगार रस की त्रिवेणी का अपूर्व संगम हुआ हैं। परंपरागत रूप से इनके साहित्य में भी वीर रस के साथ साथ भक्ति की उच्च कोटि की रचनाऐं मिलती है। भक्त कवि ईसरदास का हरिरस भक्ति का महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं तो उनकी रचना हाळा झाळा री कुण्डळियॉ वीर रस की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में गिनी जाती हैं। यह छोटी रचना होते हुए भी डिंगळ की वीर रसात्मक काव्य कृतियों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं। काव्य कला की द्रष्टि से इनके द्वारा रचे गये गीत भी असाधारण हैं। इनके उपलब्ध गीतों के नाम इस प्रकार हे। गीत सरवहिया बीजा दूदावत रा, गीत करण बीजावत रा, गीत जाम रावळ लाखावत रा आदि। ईसरदास उन गीत रचयिताओं में से हैं, जो अपने भावों को विद्वतापूर्ण ढंग से प्रकट करतें हुऐं भी व्यर्थ के शब्द जंजाल तथा पांडित्य प्रदर्शन से दूर रहे हैं। ईसरदास का रचनाकाल 16वीं शताब्दी का प्रथम चरण हैं। ईसरदास मुख्यतः भक्तकवि हैं इसलिए उन्होने अपनी वीर रसात्मक रचनाओं में किसी प्रकार के अर्थ लाभ का व्यवहारिक लगाव न रखते हुऐ सर्वथा स्वतंत्र और सच्ची अभिव्यक्ति प्रदान की हैं।

नक्र तीह निवाण निबळ दाय नावै,सदा बसे तटि जिके समंद। मन वीजै ठाकुरै न मानै,रावळ ओळगिये राजिंद॥

भेट्यो जैह धणी भाद्रेसर,चक्रवत अवर चै नह चीत।

वस विळास मळेतर वासी,परिमळ बीजै करै न प्रीत ॥

सेवग ताहरा लखा समोभ्रम,अधिपति बीजा थया अनूप।

श्रइ कि करै अवर नदि रावळ,रेखा नदी तणा गज रूप॥

क्वि तो राता धमळ कळोधर,भवठि भंजण लीळ भुवाळ।

लुहवै सरै बसंता लाजै,माण्सरोवर तणा मुणाल॥

Mr. Pratapsinh Ranaji Venziya
Mr. Pratapsinh Ranaji Venziyahttps://pratapsinh.in/
Mr. Pratapsinh Ranaji Venziya Ph.D. Scholar In History (M.A., M.Phil.) Address : 9-160-1-K, Rajput Vas, N'r Hinglaj Temple Wav - 385575

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