महात्मा ईसरदास ।। छप्पय ।।

।। छप्पय ।।

रगता सेता रंणा नमो माँ क्रसना नीला

कुळेस्सुरी आसुरी सुरी सुसिला गर्वीला,

दीरघ लघु वपु द्रढ़ा सबेही रूप विरूपा

वकला सकला व्रजा उपावंण आप अपूपा,

घण पवण हुतासण सूं प्रबळ, चामुंडा वंदूं चरण,

कवि पार तुझ ईसर कहै, कालिका जांणे कवण ।।1।।

हे माँ! आपके अनेक रूप हैं। आप अरुणवर्णा, श्वेतवर्णा तथा नीलवर्णा हो । आप भूलोक में कुलेश्वरी, पाताललोक में आसुरी शक्ति तथा देवलोक में देवशक्ति हो। आप सौम्य प्रकृति के प्राणियों में सुशीलता के रूप में तथा प्रखर पराक्रमी जनों में गर्व के रूप में शोभायमान हो। आपका स्वरूप बड़े से बड़ा (महतो महीयान्) तथा छोटे से छोटा (अणोरणीयान्) है। आप भक्तरक्षा के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो। आप सर्वरूपा हो। आप त्रिगुणातीत तथा त्रिगुणमयी हो। हे व्रज की उपास्या अम्बा! आपने अपने-आप से ही जगत् की सृष्टि की है। आप पवन और अग्नि से भी प्रबल तथा प्रचण्ड हो। हे चामुण्डा ! मैं आपके चरणों की वन्दना करता हूँ। आप कवियों की वर्णनशक्ति से परे हो, तथापि आपके दास ईसर ने आपकी महिमा का वर्णन करने की चेष्टा की है। हे कालिका! आपको कौन जान सकता है।

घम घमंत घूघरी, पाय नेउरी रणंझण,

डम डमंत डाकळी, ताळ ताळी बज्जे तंण,

पाय सिंघ गळ अडै़, चक्र झळहळे चऊदह,

मिले क्रोड़ तेतीस, उदो सुरियंद अणंदह,

अद्भूत रूप सकती अकळ, प्रेम दूत पाळंतिय

गहे गहे वार डमरू डहक, महमाया आवंतिय ।। 2।।

हे महामाया माँ! आप इस अकिंचन ईसरदास को दर्शन देने सिंह पर सवार होकर आई हो। घूघरी की घमकार और नेवर की रणझण ध्वनि से वातावरण व्याप्त है। डमरू की मधुर डम-डम ध्वनि गूंज रही है। तेतीस करोड़ देवी-देवता आनन्द से तालबद्ध करतल ध्वनि कर रहे हैं। आपका एक चरण सिंह की गर्दन पर शोभायमान है। हे आदिशक्ति चक्रेश्वरी! आपके चक्र की प्रभा चौदह लोकों में व्याप्त है। आपका स्वरूप अद्भुत है। प्रेमतत्त्व आपकी कृपा का सन्देशवाहक है जो दुःख और दीनता से बचाता है। उसकी शक्ति अपार है।

चढ़े सिंघ चामुण्ड,कमळ हुंकारव कद्धौ,

डरो चरन्तो देख, असुर भागियो अवद्धौ,

आदि सक्ति आपड़े, रूक वाहिये रमंतां,

खाळ रगत खळहळे, ढळे ढींगोळ धरंतां,

हींगोळराय अठदस हथी, भखै मैख भुवनेसरी,

कवि जोड़ पांण ईसर कहे, उदो उदो आसापुरी ।। 3।।

सिंह पर सवार चामुण्डा माता ने मुखकमल से हुंकार की, तो भैंसे के रूप में विचरण कर रहा महिषासुर जो सबके लिए अवध्य था, डरकर भागने लगा। आप आदिशक्ति ने उसके सामने प्रकट होकर उसे रोका तथा खेल-खेल में त्रिशूल का प्रहार किया। रक्त का नाला बह निकला और महिषासुर वहीं ढेर हो गया। हे अठारह भुजाओं वाली भुवनेश्वरी हिंगलाजमाता! आपके सिंह ने महिषासुर को अपना आहार बना लिया। हे आशापूरा माता! आपका भक्त ईसरदास हाथ जोड़कर कर प्रार्थना कर रहा है कि आप भक्तों की रक्षा के लिए ऐसे ही बार-बार अवतरित होती रहो।

Mr. Pratapsinh Ranaji Venziyahttps://pratapsinh.in/
Mr. Pratapsinh Ranaji Venziya Ph.D. Scholar In History (M.A., M.Phil.) Address : 9-160-1-K, Rajput Vas, N'r Hinglaj Temple Wav - 385575

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