मुग़लकालीन व्यापार और कृषिगत साधन (Mughal trade and agricultural resources)

पूर्व भूमिका : मुग़ल साम्राज्य

मुग़ल सलतनत-ए-हिंद; तुर्की: बाबर इम्परातोरलुग़ु), एक इस्लामी तुर्की-मंगोल साम्राज्य था जो 1526 में शुरू हुआ, जिसने 17 वीं शताब्दी के आखिर में और 18 वीं शताब्दी की शुरुआत तक भारतीय उपमहाद्वीप में शासन किया और 19 वीं शताब्दी के मध्य में समाप्त हुआ। मुग़ल सम्राट तुर्क-मंगोल पीढ़ी के तैमूरवंशी थे और इन्होंने अति परिष्कृत मिश्रित हिन्द-फारसी संस्कृति को विकसित किया। 1700 के आसपास, अपनी शक्ति की ऊँचाई पर, इसने भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश भाग को नियंत्रित किया – इसका विस्तार पूर्व में वर्तमान बंगलादेश से पश्चिम में बलूचिस्तान तक और उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में कावेरी घाटी तक था। उस समय 44 लाख किमी (15 लाख मील) के क्षेत्र पर फैले इस साम्राज्य की जनसंख्या का अनुमान 13 और 15 करोड़ के बीच लगाया गया था। 1725 के बाद इसकी शक्ति में तेज़ी से गिरावट आई। उत्तराधिकार के कलह, कृषि संकट की वजह से स्थानीय विद्रोह, धार्मिक असहिष्णुता का उत्कर्ष और ब्रिटिश उपनिवेशवाद से कमजोर हुए साम्राज्य का अंतिम

सम्राट बहादुर ज़फ़र शाह था, जिसका शासन दिल्ली शहर तक सीमित रह गया था। अंग्रेजों ने उसे कैद में रखा और 1857 के भारतीय विद्रोह के बाद ब्रिटिश द्वारा म्यानमार निर्वासित कर दिया। 1556 में, जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर, जो महान अकबर के नाम से प्रसिद्ध हुआ, के पदग्रहण के साथ इस साम्राज्य का उत्कृष्ट काल शुरू हुआ और सम्राट       औरंगज़ेब के निधन के साथ समाप्त हुआ, हालाँकि यह साम्राज्य और 150 साल तक चला। इस समय के दौरान, विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ने में एक उच्च केंद्रीकृत प्रशासन निर्मित किया गया था। मुग़लों के सभी महत्वपूर्ण स्मारक, उनके ज्यादातर दृश्य विरासत, इस अवधि के हैं।

प्रारंभिक इतिहास

प्रारंभिक 1500 के आसपास तैमूरी राजवंश के राजकुमार बाबर के द्वारा उमैरिड्स साम्राज्य के नींव की स्थापना हुई, जब उन्होंने दोआब पर कब्जा किया और खोरासन के पूर्वी क्षेत्र द्वारा सिंध के उपजाऊ क्षेत्र और सिंधु नदी के निचले घाटी को नियंत्रित किया। 1526 में, बाबर ने दिल्ली के सुल्तानों में आखिरी सुलतान, इब्राहिम शाह लोदी , को पानीपत के पहले युद्ध में हराया। अपने नए राज्य की स्थापना को सुरक्षित करने के लिए, बाबर को खानवा के युद्ध में राजपूत संधि का सामना करना पड़ा जो चित्तौड़ के राणा साँगा के नेतृत्व में था। विरोधियों से काफी ज़्यादा छोटी सेना द्वारा हासिल की गई, तुर्क की प्रारंभिक सैन्य सफलताओं को उनकी एकता, गतिशीलता, घुड़सवार धनुर्धारियों और तोपखाने के इस्तेमाल में विशेषता के लिए ठहराया गया है। 1530 में बाबर का बेटा हुमायूँ उत्तराधिकारी बना लेकिन पश्तून शेरशाह सूरी के हाथों प्रमुख उलट-फेर सहे और नए साम्राज्य के अधिकाँश भाग को क्षेत्रीय राज्य से आगे बढ़ने से पहले ही प्रभावी रूप से हार गए। 1540 से हुमायूं एक निर्वासित शासक बने, 1554 में साफाविद दरबार में पहुँचे जबकि अभी भी कुछ किले और छोटे क्षेत्र उनकी सेना द्वारा नियंत्रित थे। लेकिन शेर शाह सूरी के निधन के बाद जब पश्तून अव्यवस्था में गिर गया, तब हुमायूं एक मिश्रित सेना के साथ लौटे, अधिक सैनिकों को बटोरा और 1555 में दिल्ली को पुनः जीतने में कामयाब रहे।

हुमायूं ने अपनी पत्नी के साथ मकरन के खुरदुरे इलाकों को पार किया, लेकिन यात्रा की निष्ठुरता से बचाने के लिए अपने शिशु बेटे जलालुद्दीन को पीछे छोड़ गए। जलालुद्दीन को बाद के वर्षों में अकबर के नाम से बेहतर जाना गया। वे सिंध के शहर, अमरकोट में पैदा हुए जहाँ उनके चाचा अस्करी ने उन्हें पाला। वहाँ वे मैदानी खेल, घुड़सवारी और शिकार करने में उत्कृष्ट बने और युद्ध की कला सीखी। तब पुनस्र्त्थानशील हुमायूं ने दिल्ली के आसपास के मध्य पठार पर कब्ज़ा किया, लेकिन महीनों बाद एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई, जिससे वे दायरे को अस्थिर और युद्ध में छोड़ गए।

अकबर का दरबार

14 फरवरी 1556 को दिल्ली के सिंहासन के लिए सिकंदर शाह सूरी के खिलाफ एक युद्ध के दौरान, अकबर अपने पिता के उत्तराधिकारी बने। उन्होंने जल्द ही 21 या 22 की उम्र में अपनी अठारहवीं जीत हासिल करी। वह अकबर के नाम से जाने गए। वह एक बुद्धिमान शासक थे, जो निष्पक्ष पर कड़ाई से कर निर्धारित करते थे। उन्होंने निश्चित क्षेत्र में उत्पादन की जाँच की और निवासियों से उनकी कृषि उपज के 1/5 का कर लागू किया। उन्होंने एक कुशल अधिकारीवर्ग की स्थापना की और धार्मिक मतभेद से सहिष्णुशील थे, जिससे विजय प्राप्त किए गए लोगों का प्रतिरोध नरम हुआ। उन्होंने राजपूतों के साथ गठबंधन किया और हिन्दू जनरलों और प्रशासकों को नियुक्त किया था।

उमैरिड्स के सम्राट अकबर के बेटे जहाँगीर ने 1605-1627 के बीच (22 वर्ष) साम्राज्य पर शासन किया। अक्टूबर 1627 में, उमैरिड्स के सम्राट जहाँगीर के बेटे शाहजहाँ सिंहासन के उत्तराधिकारी बने, जहाँ उन्हें भारत में एक विशाल और समृद्ध साम्राज्य विरासत में मिला। मध्य-सदी में यह शायद विश्व का सबसे बड़ा साम्राज्य था। शाहजहाँ ने आगरा में प्रसिद्ध ताज महल (1630–1653) बनाना शुरू किया जो फारसी वास्तुका उस्ताद अहमद लाहौरी द्वारा शाहजहाँ की पत्नी मुमताज़ महल के लिए कब्र के रूप में बनाया गया था, जिनका अपने 14 वें बच्चे को जन्म देते हुए निधन हुआ। 1700 तक यह साम्राज्य वर्तमान भारत के प्रमुख भागों के साथ अपनी चरम पर पहुँच चुका था, औरंगजेब आलमगीर के नेतृत्व के तहत उत्तर पूर्वी राज्यों के अलावा, पंजाब की सिख भूमि, मराठाओं की भूमि, दक्षिण के क्षेत्र और अफगानिस्तान के अधिकांश क्षेत्र उनकी जागीर थे। औरंगजेब, महान तुर्क राजाओं में आखिरी थे। फारसी भोजन का जबर्दस्त प्रभाव भारतीय रसोई की परंपराओं में देखा जा सकता है जो इस अवधि में प्रारंभिक थे।

मुगल राजवंश

अकबर के अंतर्गत मुग़ल साम्राज्य औरंगजेब के अधीन साम्राज्य के क्षेत्र में विस्तार हुआ। मध्य-16 वीं शताब्दी और 17-वीं शताब्दी के अंत के बीच मुग़ल साम्राज्य भारतीय उपमहाद्वीप में प्रमुख शक्ति थी। 1526 में स्थापित, यह नाममात्र 1857 तक बचा रहा, जब वह ब्रिटिश राज द्वारा हटाया गया। यह राजवंश कभी कभी तिमुरिड राजवंश के नाम से जाना जाता है क्योंकि बाबर तैमूर का वंशज था।

फ़रग़ना वादी से आए एक तुर्की मुस्लिम तिमुरिड सिपहसालार बाबर ने मुग़ल राजवंश को स्थापित किया। उन्होंने उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों पर हमला किया और दिल्ली के शासक इब्राहिम शाह लोधी को 1526 में पानीपत के पहले युद्ध में हराया। मुग़ल साम्राज्य ने उत्तरी भारत के शासकों के रूप में दिल्ली के सुल्तान का स्थान लिया। समय के साथ, उमेर द्वारा स्थापित राज्य ने दिल्ली के सुल्तान की सीमा को पार किया, अंततः भारत का एक बड़ा हिस्सा घेरा और साम्राज्य की पदवी कमाई। बाबर के बेटे हुमायूँ के शासनकाल के दौरान एक संक्षिप्त राजाए के भीतर (1540-1555), एक सक्षम और अपने ही अधिकार में कुशल शासक शेर शाह सूरी के अंतर्गत अफगान सूरी राजवंश का उदय देखा। हालाँकि, शेर शाह की असामयिक मृत्यु और उनके उत्तराधिकारियों की सैन्य अक्षमता ने 1555 में हुमायूँ को अपनी गद्दी हासिल करने के लिए सक्षम किया। हालाँकि, कुछ महीनों बाद हुमायूं का निधन हुआ और उनके 13 वर्षीय बेटे अकबर ने गद्दी हासिल करी।

मुग़ल विस्तार का सबसे बड़ा भाग अकबर के शासनकाल (1556-1605) के दौरान निपुण हुआ। वर्तमान भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तराधिकारि जहाँगीर , शाहजहाँ और औरंगजेब द्वारा इस साम्राज्य को अगले सौ साल के लिए प्रमुख शक्ति के रूप में बनाया रखा गया था। पहले छह सम्राट, जिन्होंने दोनों “विधि सम्मत” और “रेल्” शक्तियों का आनंद लिया, उन्हें आमतौर पर सिर्फ एक ही नाम से उल्लेख करते हैं, एक शीर्षक जो प्रत्येक महाराज द्वारा अपने परिग्रहण पर अपनाई जाती थी। प्रासंगिक शीर्षक के नीचे सूची में मोटे अक्षरों में लिखा गया है।

अकबर ने कतिपय महत्वपूर्ण नीतियों को शुरू किया था, जैसे की धार्मिक उदारवाद (जजिया कर का उन्मूलन), साम्राज्य के मामलों में हिन्दुओं को शामिल करना और राजनीतिक गठबंधन/ हिन्दू राजपूत जाति के साथ शादी, जो कि उनके वातावरण के लिए अभिनव थे। उन्होंने शेर शाह सूरी की कुछ नीतियों को भी अपनाया था, जैसे की अपने प्रशासन में साम्राज्य को

सरकारों में विभाजित करना। इन नीतियों ने निःसंदेह शक्ति बनाए रखने में और साम्राज्य की स्थिरता में मदद की थी, इनको दो तात्कालिक उत्तराधिकारियों द्वारा संरक्षित किया गया था, लेकिन इन्हें औरंगजेब ने त्याग दिया, जिसने एक नीति अपनाई जिसमें धार्मिक सहिष्णुता का कम स्थान था। इसके अलावा औरंगजेब ने लगभग अपने पूरे जीवन-वृत्ति में डेक्कन और दक्षिण भारत में अपने दायरे का विस्तार करने की कोशिश की। इस उद्यम ने साम्राज्य के संसाधनों को बहा दिया जिससे मराठा , पंजाब के सिखों और हिन्दू राजपूतों के अंदर मजबूत प्रतिरोध उत्तेजित हुआ।

औरंगजेब के शासनकाल के बाद, साम्राज्य में गिरावट हुई। बहादुर शाह ज़फ़र के साथ शुरुआत से, मुगल सम्राटों की सत्ता में उत्तरोत्तर गिरावट आई और वे कल्पित सरदार बने, जो शुरू में विभिन्न विविध दरबारियों द्वारा और बाद में कई बढ़ते सरदारों द्वारा नियंत्रित थे। 18 वीं शताब्दी में, इस साम्राज्य ने पर्शिया के नादिर शाह और अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली जैसे हमलावरों का लूट को सहा, जिन्होंने बार बार मुग़ल राजधानी दिल्ली में लूटपाट की। भारत में इस साम्राज्य के क्षेत्रों के अधिकांश भाग को ब्रिटिश को मिलने से पहले मराठाओं को पराजित किया गया था। 1803 में, अंधे और शक्तिहीन शाह आलम II ने औपचारिक रूप से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का संरक्षण स्वीकार किया। ब्रिटिश सरकार ने पहले से ही कमजोर मुग़लोँ को “भारत के सम्राट” के बजाय “दिल्ली का राजा” कहना शुरू कर दिया था, जो 1803 में औपचारिक रूप से प्रयोग किया गया, जिसने भारतीय नरेश की ब्रिटिश सम्राट से आगे बढ़ने की असहज निहितार्थ से परहेज किया। फिर भी, कुछ दशकों के बाद सम्राट के नाममात्र नौकरों के रूप में और उनके नाम पर, अपने नियंत्रण के अधीन क्षेत्रों में शासन जारी रखा, 1827 में यह शिष्टाचार भी खत्म हो गया था। सिपाही विद्रोह के कुछ विद्रोहियों ने जब शाह आलम के वंशज बहादुर जफर शाह II से अपने निष्ठा की घोषणा की, तो ब्रिटिशों ने इस संस्था को पूरी तरह समाप्त करने का निर्णय लिया। उन्होंने 1857 में अंतिम मुग़ल सम्राट को पद से गिराया और उन्हें बर्मा के लिए निर्वासित किया, जहाँ 1862 में उनकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार मुग़ल राजवंश का अंत हो गया, जिसने भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण अध्याय का योगदान किया था।

मुगलकाल में कृषिगत तकनीक

भारतीय इतिहास में मुगलकाल में कृषिगत तकनीक में प्रगति के संकेत मिलते हैं। तत्कालीन कृषि में प्रयोग किए जाने वाले विविध कृषि यंत्रों द्वारा भारतीय कृषक खेतों से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने की क्षमता रखते थे। मुगलकालीन कृषि कर्म में अपनायी जा रही तकनीकों यथा- सिंचाई, कृषि, यंत्रों के प्रयोग, खाद-बीज आदि के प्रयोग, फसलों के रोपण तथा उत्पादन एवं अनाज के भण्डार और संरक्षण की विशिष्ट तकनीक विकसित अवस्था में थी।

“During the Mughal Period in Indian history, there are many signs that indicate that special agricultural techniques were used by the farmers. The Indian farmers using Contemporary agricultural tools were able to harvest good crops. Some of the major techniques used by the farmers were irrigation of crops, use of agricultural tools, use of fertilizers and seeds, special techniques of production, storage and preservation of plantation and produce was in a developed state.”

प्राचीन काल की भाँति मुगलकाल में भी भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान थी। मुगल साम्राज्य की लगभग 85 प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में निवास करती थी, जिसमें कृषि पर आधारित वर्ग की बहुतायत थी। लघु उद्योग एवं व्यापार आदि की अच्छी वृद्धि के बाद भी तत्कालीन आर्थिक गतिविधियों में कृषि कार्य सर्वोपरि था। ऐतिहासिक स्रोतों एवं विदेशी यात्रियों के विवरण से हमें इसकी जानकारी प्राप्त होती है, परंतु उस काल में कृषि फसलों का उत्पादन किस विधा से होता था? परिस्थितियों के अनुरूप कृषि कार्य को ढालकर उत्पादन में विशिष्टता का सूत्रपात कैसे किया जाता था? अर्थात तत्कालीन कृषि प्रणाली पर विवरण अत्यल्प है, फिर भी यत्र-तत्र इस संदर्भ में जो भी विवरण प्राप्त होते हैं उसके आधार पर एक मोटी धारणा अवश्य बनती है, जिसके आधार पर तत्कालीन कृषिगत तकनीकी विशिष्टता का आंकलन संभव है।

सिंचाई तकनीक

मुगलकाल में कृषि उत्पादन मानसून के साथ जुए सा व्यवसाय था, क्योंकि जल का मुख्य स्रोत वर्षा ही थी। अधिक या कम वर्षा होने पर कृषक कठिनाई में पड़ जाता था। कृषक को अवर्षण की स्थिति में मानसून पर निर्भरता से मुक्त होने के लिये सिंचाई के कृत्रिम साधनों पर आश्रित होना पड़ता था। बाबर के अनुसार, चौदहवीं एवं पन्द्रहवीं शताब्दी में भारत की भूमि बहुत उपजाऊ थी तथा वर्षा भी अच्छी होती थी। कृषकों को सिंचाई के कृत्रिम साधनों की जानकारी भी थी, फलत: उत्पादन भी अच्छा होता था। सिंचाई के कृत्रिम साधनों के अन्तर्गत कुएँ, तालाब तथा नहरें आदि सिंचाई के कृत्रिम साधन के मुख्य श्रोत थे।

कुएँ

कुएँ सिंचाई के मुख्य स्रोत थे। मुगल काल में अधिकतर कुएँ कच्चे होते थे। दरअसल इट के पक्के कुँओं का निर्माण बहुत खर्चीला था। सन 1660 में अजमेर के मेड़ता परगना में अवस्थित लगभग 6000 कुँओं में मात्र 20 कुएँ पक्के थे। सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भी पूर्वी राजस्थान के 18 गाँवों के 528 कुँओं में से मात्र 41 कुएँ ही पक्के थे। मुगलकाल में गंगा के ऊपरी मैदानी क्षेत्रों तथा दक्षिणी भाग में कुएँ सिंचाई के मुख्य स्रोत थे, जिससे इन क्षेत्रों में कृषि उत्पादन अच्छी स्थिति में था। कुएँ से पानी निकाल कर उसे नालियों के माध्यम से खेतों तक पहुँचाने की कई विधियाँ थीं।

रहट

रहट या अरहट जिसे अंग्रेजों द्वारा पर्सियन व्हील नाम से संबोधित किया गया है, सिंचाई हेतु प्रयुक्त की जाने वाली एक विलक्षण मशीन थी, जो चेन तथा गीयर पर आधारित थी। मुगलकाल में लाहौर, दिपालपुर, तथा सरहिंद में इसका व्यापक प्रयोग होता था। भारत में रहट के प्रवेश का वास्तविक समय तेरहवीं या चौदहवीं शताब्दी में माना जाता है किंतु इसका सर्वप्रथम एवं विस्तृत वर्णन बाबर द्वारा सोलहवीं शताब्दी में किया गया है। प्रारंभ में लकड़ी की इस विलक्षण मशीन पर केवल धनी किसानों का ही अधिपत्य बना रहा, परंतु सोलहवीं शताब्दी तक धीरे-धीरे यह आम किसानों की पहुँच के भीतर हो गया। रहट से पानी निकालने की प्रक्रिया यह थी कि कुएँ की गहराई के अनुसार दो समान लंबाई की रस्सियों के एक सिरे की ओर लकड़ी का एक लट्ठा बाँध दिया जाता था, जिसके साथ घड़े बंधे होते थे।

दोनों रस्सियों को उस चर्ख पर चढ़ाते हुए जो कुएँ पर लगा होता था, घड़ों को लट्ठे सहित कुएँ में ढीला छोड़ा जाता था। इस चर्ख से धुरे से एक दूसरी चर्खी जुड़ी रहती थी, जिसे बैल घुमाता था। इस चर्खी के दाँते दूसरी चर्खी के दाँतों से फँसे होने के कारण बैलों के घूमने पर खड़े वाली चर्खी भी घूमती थी और इस प्रक्रिया से पानी कुएँ से बाहर निकाला जाता था। कुएँ से बाहर आने पर घड़े का पानी कुएँ के पास ही स्थिति एक कठौते में गिराया जाता था, जो नालियों के माध्यम से अपेक्षित खेतों तक पहुँचता था। सिंचाई कार्य में प्रयुक्त होने वाले इस महत्त्वपूर्ण यंत्र ने सिंचाई की संभावना को पर्याप्त बढ़ा दिया। सिंचाई की इस प्रक्रिया में बैलों के प्रयोग से मानव ऊर्जा की बचत होती थी। जिसका प्रयोग कृषि से संबंधित अन्य उद्यमों में किया गया।

चरस

कुएँ से पानी निकालने की दूसरी सामान्य विधि चरस थी। बाबर के अनुसार आगरा, चंदवार, बयाना आदि क्षेत्रों में चरस द्वारा सिंचाई होती थी। इस विधि में कुएँ की घिरनी पर रस्सी चढ़ाकर उसके एक सिरे में चमड़े का बड़ा बैग बाँधा जाता था। जबकि दूसरा सिरा एक बैल से बंधा होता था। बैल को कुएँ के समीप खड़ा कर पानी का बैग कुएँ में ढीला छोड़ा जाता था। बैग में पर्याप्त पानी भर जाने के बाद एक व्यक्ति बैल को हांकता हुआ कुएँ से दूर ले जाता था और इस प्रकार खींचकर कुएँ से बाहर आये पानी से भरे बैग को कुएँ पर खड़ा एक दूसरा व्यक्ति एक कठौते में खाली करता जाता था। कठौते से जुड़ी नालियों द्वारा पानी खेतों तक पहुँच जाता था।

बाबर ने इस विधि को अत्यंत घृणित बताया है क्योंकि जब बैल पानी का बैग एक बार खींचकर प्रक्रिया दुहराने के लिये पुन: कुएँ की ओर लौटता था तो रस्सी, मार्ग के पड़े गोबर एवं मूत्र आदि को लथेड़ती जाती थी जिससे यह गंदगी रस्सी द्वारा कुएँ में चली जाती थी, और कुएँ का जल दूषित हो जाता था। सिंचाई की चरस तकनीक से ढेंकली के मुकाबले अधिक गहरे कुएँ से पानी खींचा जा सकता था। अत: यह तकनीक उन क्षेत्रों के लिये अधिक उपयोगी थी जहाँ कुएँ का जलस्तर अपेक्षाकृत अधिक नीचे होता था। इस उपकरण के माध्यम से ढेंकली की अपेक्षा अधिक मात्रा में पानी निकाला जा सकता था अत: इसके प्रयोग द्वारा अधिक बड़े खेतों की सिंचाई संभव थी।

ढेंकली

जिन क्षेत्रों में कुँओं का जलस्तर अपेक्षाकृत ऊँचाई पर होता था वहाँ लीवर सिद्धांत पर आधारित ढेंकली नामक उपकरण सिंचाई हेतु प्रयुक्त होता था। वाराणसी के भारत कला भवन में संग्रहित मृगावत की चित्रित हस्तलिपि, जिसका चित्रण उत्तर प्रदेश में 1525-70 के बीच हुआ, इस उपकरण को दर्शाती है। उस उपकरण के नीचे उथले कुएँ के किनारे पर एक खूंटी गड़ी होती थी और दूसरे किनारे पर एक कांटेनुमा हिस्सा लगा रहता था। इस कांटे के बीच में एक लंबा खंभा उत्तोलक के सिद्धांत के अनुसार लगा रहता था। इस खंभे में कुएँ के किनारे पर एक बाल्टी लटकी होती थी और दूसरे किनारे पर भारी पत्थर रहता था। एक आदमी रस्सी खींचकर इस यंत्र को चला सकता था। रस्सी को कुएँ के अंदर खींचा जाता था और पानी से भरी बाल्टी खंभे से उठाकर खोल दी जाती थी, जिससे पानी खेतों में पहुँच जाए।

इस यंत्र द्वारा कुएँ से पानी बाहर निकालने के लिये कड़े श्रम की आवश्यकता थी, फिर भी कम खर्चीला होने के कारण यह साधारण किसानों की पहुँच में था। कुँओं से पानी निकालकर सिंचाई करने की उपर्युक्त विधियों के अलावा एक सामान्य विधि पानी को ढोकर खेतों तक पहुँचाने की थी। बाबर के अनुसार कुछ स्थानों पर आवश्यकतानुसार स्त्री-पुरूष कुँओं से डोल या मटकों में पानी भर-भरकर खेतों में पहुँचाते थे। मुगलकालीन किलों में सीढ़ीदार पक्के कुँओं, जिन्हें बावली कहा जाता था, का निर्माण भी महत्त्वपूर्ण था। इन बावलियों के पानी का प्रयोग किले से संबद्ध बाग-बगीचों की सिंचाई हेतु किया जाता था।

इस प्रकार मुगलकाल में कुँओं के निर्माण एवं विविध तकनीक से उनमें से पानी निकालकर सिंचाई की व्यवस्था से कृषि भूमि के विस्तार एवं खेतों से अधिक उत्पादन की आशा की जा सकती है। यह अनुमान लगाना भी कठिन नहीं है कि इसके कारण कृषि को अधिक सूचारू व्यवस्था प्रदान की जा सकी, क्योंकि इससे जहाँ एक ओर सिंचाई का जल नियंत्रित करने में सहायता मिली वहीं फसलों को जलाधिक्य से बचाया भी जा सका। विशेषकर पक्के कुँओं के विकास एवं फारसी रहट पर पूँजी निवेश अधिक मूल्य वाली फसलों की ओर बढ़ने का संकेत देता है। अतएव कृषि की प्रगति की दृष्टि से यह विकास अति महत्त्वपूर्ण था।

नहरें

सिंचाई के उद्देश्य से सोलहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में बाबर ने भारत में नहरों की कृत्रिम व्यवस्था का अभाव बताया है किंतु बाद में कृषि भूमि सिंचित करने हेतु कुछ नहरों के निर्माण के विवरण मिलते हैं। भारत के उत्तरी मैदान, विशेष रूप से ऊपरी गंगा एवं सिंधु क्षेत्र, में सिंचाई हेतु अनेक नहरें निर्मित की गई। नहरें दो प्रकार की होती थीं, प्राकृतिक एवं मानव निर्मित। नदियों द्वारा अपना मार्ग बदल लेने के कारण प्राकृतिक रूप से नहरों का उद्भव हो जाता था। ऐसी नहरें मुख्य नदी से शाखाओं में बँटकर प्रणालिकाओं के रूप में बहती थी, जिनका प्रयोग सिंचाई हेतु किया जाता था। मुगलकाल में इस प्रकार से निर्मित कुछ प्राकृतिक नहरें बहुत विशाल थी। दक्षिण भारत में इस काल में कुछ छोटी नहरों के प्रमाण मिलते हैं, किंतु उत्तरी भारत में वास्तविक रूप से कई बड़ी नहरों का निर्माण सिंचाई सुविधाओं के विस्तार और उन्हें प्रभावी बनाने की दृष्टि से किया गया। सत्रहवीं शताब्दी में शाहजहाँ द्वारा बड़ी संख्या में नहरों के निर्माण का विवरण मिलता है। पूर्वी यमुना की पुरानी नहर शाहजहाँ के ही काल में खोदी गई। फिरोजशाह के काल में कृषि भूमि को सिंचित करने की दृष्टि से यमुना नदी के दूसरे किनारे पर निर्मित करायी गई नहर की मरम्मत अकबर के काल में की गई। बाद में यह नहर पुन: नष्ट हो गई जिसे शाहजहाँ ने अपने शासनकाल में नये रूप में बनवाया। फसलों की बुवाई की अवधि में इस नहर के पानी को बाँटने की व्यवस्था की गई थी।

शाहजहाँ के काल में नहर-ए-फैज या नहर-ए-बहिस्त (स्वर्ग की नहर) 150 मील लंबी थी जो यमुना नदी के तराई क्षेत्र में प्रवेश करते ही अलग हो जाती थी और पहले दक्षिण-पश्चिम एवं फिर दक्षिण पूर्व दिशा में बहते हुए दिल्ली के निकट अपनी मूल नदी से मिल जाती थी। एक अन्य नहर जो लंबाई में 100 मील से कम थी, रावी नदी से निकलती थी तथा लाहौर के निकट पुन: उसी में मिल जाती थी। इसका निर्माण शाहजहाँ के आदेश पर अली मर्दान खां द्वारा कराया गया था। एक लाख रूपये के व्यय से निर्मित इस नहर से कृषि का अधिक विकास हुआ। शाहजहाँ के ही काल में पंजाब में रावी नदी से निकाली गई ‘शाह नहर’ के अतिरिक्त तीन अन्य छोटी नहरों का भी ब्यौरा मिलता है। जिन्हें सत्रहवीं शताब्दी के स्थानीय इतिहासकारों ने कृषि की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी बताया है। साम्राज्य के अन्य भागों में भी कुछ नहरें सिंचाई हेतु निर्मित की गईं किंतु उनका महत्व सर्वथा स्थानीय था।

तालाब, कृत्रिम बाँध एवं झीलें

मुगलकाल में कुँओं तथा नहरों के अलावा तालाब तथा झीलें भी सिंचाई के कृत्रिम साधन के रूप में प्रयोग किये जाते थे। प्राय: गाँवों में एकाधिक तालाब होते थे। मध्य भारत, दकन और दक्षिण भारत में तालाब सिंचाई कार्य में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। दक्षिण भारत के गोलकुण्डा साम्राज्य को ट्रेवरनियर ने अनेक तालाबों से युक्त बताया था। ये तालाब एक प्रकार के कृत्रिम बाँध के रूप में स्थापित थे और इनका प्रयोग वर्षा काल के बाद खेतों की सिंचाई हेतु होता था। खानदेश तथा बरार में कृषकों को सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध कराने की दृष्टि से बाँध निर्माण हेतु शाहजहाँ के शासनकाल में 40 से 50 हजार रूपये पेशगी के तौर पर देने के प्रमाण मिलते हैं। मेवाड़ में सोलह कुरोह के वृत्ताकार क्षेत्रफल में घेबर नामक झील अवस्थित थी, जो उस क्षेत्र में गेहूँ की कृषि में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी।

विजयनगर साम्राज्य में पंद्रहवीं सोलहवीं शताब्दी के दौरान वहाँ निर्मित मदाक झील तत्कालीन निर्माण प्रौद्योगिकी का श्रेष्ठ उदाहरण है। ऐतिहासिक तौर पर जिस प्रकार यूरोप के लिये कृषि क्षेत्र में खाद का महत्व था, भारतीय कृषि के लिये सिंचाई उतने ही निर्णायक रूप से महत्त्वपूर्ण थी। यही कारण था कि भारतीय इतिहास में सिंचाई के क्षेत्र में उपर्युक्त महत्त्वपूर्ण आविष्कारों एवं उपकरणों का विकास हुआ। विशेष रूप से सिंचाई सुविधाओं को उपलब्ध कराने के प्रयास में व्यक्ति एवं राज्य दोनों की पहल ने बड़ा योगदान दिया और इससे उल्लेखनीय तकनीकी और आर्थिक विकास संभव हुआ।

कृषि यंत्र तथा उनके उपयोग की तकनीक

मुगल काल में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के फलस्वरूप विकसित सिंचाई यंत्रों जिनका विवरण ऊपर किया गया है, के अतिरिक्त हल, फावड़े, कुदाल, खुरपे, जुआठ, पाटा, ड्रील तथा हंसुआ आदि कृषि यंत्रों का प्रयोग सामान्य रूप से होता था। कृषि कार्य में जुताई की प्रक्रिया सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है। खेतों में बीज डालने के पूर्व मिट्टी के ढेलों को तोड़कर उसे ढीली करने एवं भुरभुरी बनाने के लिये हलों का प्रयोग किया जाता है। मुगल काल में भारत में खेतों की जुताई हेतु प्रयुक्त किये जा रहे हल को टेरी ने ‘फुट प्लाऊ’ नाम से संबोधित किया है जो तत्कालीन यूरोप में प्रयुक्त हो रहे एक प्रकार के हल के समान था।

यूरोपीय स्रोतों में तत्कालीन भारतीय हलों पर प्राय: इसके अति साधारण एवं हल्केपन का लांछन लगाया जाता रहा है कि यह मिट्टी को गहराई तक खोदने की क्षमता नहीं रखता था और मिट्टी की ऊपरी सतह को खरोचता भर था, किंतु अब तक इस क्षेत्र में हुए अनुसंधानों से प्रमाणित हो चुका है कि ऐसा तकनीकी कमजोरी लोहे के मँहगा होने के कारण नहीं थी, बल्कि वास्तव में इसका कारण यह था कि यहाँ की जलवायु एवं मिट्टी की परिस्थितियों में ऐसे हल्के व साधारण हल ही उपयोगी थे।

इनके द्वारा सतह को केवल ढीला कर दिया जाता था। ताकि जड़ों को पर्याप्त मात्रा में हवा मिल सके और जड़ों के नाजुक रेशे बढ़ सकें, साथ ही नीचे की नम मिट्टी के ऊपर आ जाने और उनके धूप में सूख पाने का खतरा भारतीय कृषक नहीं उठाना चाहते थे। अतएव कम लोहे वाले हल्के तथा साधारण हलों के कारण उनकी कार्य कुशलता में कोई कमी नहीं आयी। इस तथ्य को टेरी ने भी स्वीकार किया था। भारत में जहाँ एक ओर सूखी तथा कड़ी मिट्टी वाले क्षेत्रों में प्राचीन काल से ही लोहे के फाल वाले हलों का प्रयोग हो रहा था, जो मुगलकाल में भी प्रचलन में था, वहीं दूसरी ओर फायर ने भारत के तटवर्ती क्षेत्रों की नम मिट्टी पर जोते जाने वाले कुछ ऐसे हलों के विषय में विवरण दिये हैं। जिनमें लोहे की बजाय कठोर लकड़ी की फाल लगी होती थी। 

विभिन्न उद्देश्यों के लिये अलग-अलग प्रकार के हल थे। प्रत्येक हल बैलों के द्वारा खींचे जाते थे जो अलग-अलग नस्ल के होते थे। हल में जोतने के संदर्भ में भारत के बैल इंग्लैण्ड के बैलों की अपेक्षा अधिक उपयोगी थे क्योंकि भारतीय हल जहाँ बैलों के कूबड़ में फँसाकर खींचे जाते थे वहीं इंग्लैण्ड के हल बैलों के सींग में बाँधकर प्रयोग किये जाते थे। अतएव भारतीय बैलों का कूबड़ जहाँ हल खींचने में तकनीकी रूप से इंग्लैण्ड के बैलों से अधिक सक्षम स्वीकार किया जायेगा। वहीं यह तकनीक इंग्लैण्ड की जुताई तकनीक की उपेक्षा कम अमानवीय भी थी। कभी-कभी जुताई के दौरान हल की फाल को अतिरिक्त दबाव देने के लिये कृषक उसके ऊपर किसी बालक को खड़ा कर देते थे।

खेतों में बीज बोने के लिये मुगलकाल में ‘ड्रील’ नामक एक यंत्र का प्रयोग किया जाता था। जो तकनीकी रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। बीज डालने के बाद लकड़ी के साधारण यंत्र का प्रयोग खेतों को समतल करने के लिये किया जाता था। ‘पाटा’ नामक यह यंत्र समतल लकड़ी का एक पटरा होता था, जिसे बैल खींचता था। खेत की मिट्टी को खोदने, मेड़ बनाने एवं नालियों आदि की खुदाई करने के लिये लोहे के फाल वाले कुदाल तथा फावड़े प्रयोग किये जाते थे जिसमें लकड़ी की मेंख लगी होती थी। पौधों की निराई-गुड़ाई करने के लिये खुरपे का प्रयोग सामान्य रूप से उसी प्रकार किया जाता था, जिस प्रकार वर्तमान में किया जाता है। फसलों की कटाई के लिये हंसुआ एक सामान्य यंत्र था।

खाद बीज एवं कीटनाशक आदि के प्रयोग की तकनीक 

भूमि की उर्वरा शक्ति को स्थापित रखने एवं अधिक उत्पादकता के उद्देश्य से खेतों में विविध प्रकार की खादों का प्रयोग भारत में प्राचीन काल से ही होता आ रहा है। अर्थशास्त्र में शहद, गोबर, हड्डियों एवं मछलियों का उर्वरक के रूप में प्रयोग किये जाने का वर्णन मिलता है। इस आधार पर यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि मुगल काल में भी लगभग ऐसे ही पदार्थों का प्रयोग खेतों में उर्वरक के रूप में होता था। विविध तथ्यों से यह अनुमान पुष्ट भी होता है। विशेष रूप से पशुओं के गोबर व इसी तरह की खादों ने खेती की उर्वरता को बनाये रखने व बढ़ाने में प्रर्याप्त योगदान दिया। कृषि पराशर नामक ग्रंथ में गाय के गोबर से मिश्रित खाद बनाने और बुवाई के समय उनके प्रयोग का स्पष्ट संदर्भ मिलता है। तटवर्ती क्षेत्रों में कुछ फसलों के उत्पादन में उर्वरक के रूप में मछलियों का प्रयोग किया जाता था। गुजरात में गन्ने तथा कोंकण में नारियल की कृषि में मछली की खाद का प्रयोग विशेष रूप से होता था। इसके अतिरिक्त फसलों की अदला-बदली की परंपरागत बुवाई के ज्ञान ने भी कृषकों को भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाये रखने में विशेष योगदान दिया।

खेतों में खाद डालने की प्रक्रिया भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं थी। फसलों की प्रकृति के अनुसार ही खाद का प्रकार एवं उसकी मात्रा निर्धारित की जाती थी। आमतौर पर खेतों में खाद डालने की दो विधियाँ प्रचलित थीं। एक यह कि विभिन्न उर्वरक पदार्थों के मिश्रण का घोल बनाकर बीज में ही लगा दिया जाता था और समझा जाता था कि इससे अंकुरण बेहतर होगा, या फिर खाद को बीज बोते समय अथवा अंकुरण के बाद खेतों में डाला जाता था। आधुनिक काल की भांति सुधरी हुई नस्ल के संकरित बीज, तैयार करने की तकनीक का उस काल में नितांत अभाव होने के कारण फसलों से प्राप्त पुराने बीज ही परंपरागत रूप से बोये जाते थे।

कीटनाशक आदि के प्रयोग की भी स्पष्ट जानकारी प्राप्त नहीं होती तथापि प्राचीन काल में फसलों को कीड़ों तथा चूहों आदि से बचाने के उद्देश्य से अपनाये जाने वाले कतिपय उपाय मुगलकाल में भी अवश्य ही आजमाये जाते रहे होंगे। फसलों को कीड़ों से सुरक्षित रखने हेतु कुछ विशेष वनस्पतियों की भस्म तथा गोबर के कण्डे की राख का छिड़काव किया जाता था। फसलों की चिड़ियों आदि से रक्षा के लिये खेतों के बीच मानव आकृति वाले कृत्रिम पुतले खड़े किये जाते थे।

रोपण एवं उत्पादन की तकनीक

खेतों में बीज रोपित करने के पूर्व हल द्वारा खेतों की जुताई की जाती थी। इसमें मिट्टी के बड़े ढेले टूट-फूट जाते थे और मिट्टी ढीली पड़ जाती थी। इसके बाद खेतों से खर-पतवार साफ कर उसमें बीज रोपित किये जाते थे। बीज बोने की भी कई विधियाँ थीं, जिसमें छिड़क कर बोना सबसे आसान विधि थी। कुछ फसलों जैसे कपास आदि के रोपण में भारतीय किसान ‘ड्रिल यंत्र’ का प्रयोग करते। इस यंत्र के प्रयोग द्वारा बीज बोने की तकनीक ‘डिबलिंग’ कहलाती थी। इसमें किसान खेत में एक खोखली मेंख गाड़ कर उसके छिद्र में से कपास के बीज जमीन में डालते थे और ऊपर से उसमें मिट्टी भर देते थे। ऐसा अधिक उत्पादन की दृष्टि से किया जाता था।

धान की बुवाई का तरीका अन्य फसलों की अपेक्षा कुछ अलग था। धान के बीज खेत के एक हिस्से में मानसून के पूर्व छींट कर पानी दे दिया जाता था। अंकुरण के पश्चात जब धान के पौधे कुछ बढ़ जाते थे, तो उन्हें सावधानीपूर्वक जड़ सहित उखाड़ कर पानी से भरे खेतों में अपेक्षित दूरी रखते हुए पंक्तियों में रोपित कर दिया जाता था। ‘धान उत्पादन’ की यह परंपरागत तकनीक आज भी भारत में प्रचलित है। बीज रोपण के संदर्भ में सत्रहवीं शताब्दी के दौरान एक महत्त्वपूर्ण सुझाव यह सामने आया कि बीज को तीन चरणों में बोना चाहिए। कुछ बीजों को पहले चरण में बोना चाहिए, कुछ थोड़ी देर से और शेष इसके भी बाद ताकि अगर इनमें से कुछ बीज खराब भी हो जायें तो शेष बीज अंकुरित हो सकें।

बीज बोने के तुरंत बाद खेत को समतल करने की प्रक्रिया की जाती थी, जिससे की बीज मिट्टी से ढक जाय। यह कार्य बैलों द्वारा खींचे जाने वाले एक मोटे समतल पटरे द्वारा किया जाता था, जिसे ‘पाटा’ कहा जाता था। बैलों द्वारा पाटा खींचे जाने के दौरान कृषक दबाव डालने के उद्देश्य से पाटे पर दोनों पैर फैला कर खड़ा रहता था। तुहफत-ए-पंजाब इस उपकरण को सोहाग नाम देता है। और इसके कार्यों में बीज को मिट्टी से ढंकने, ढेले तोड़ने तथा खेत के सभी हिस्सों में समान रूप से नमी फैलाने का उल्लेख करता है। अंकुर आने के बाद पौधों के थोड़ा बड़े होने पर उनकी जड़ों को हवा देने के उद्देश्य से खुरपे से उनके आस-पास की मिट्टी ढीला करने अर्थात पौधों की निराई तथा गुड़ाई आदि की प्रिक्रिया की जाती थी। धान के पौधों की निराई दो बार करना अधिक उपयोगी समझा जाता था।

बीच-बीच में संबंधित फसल को आवश्यकतानुसार सिंचित किया जाता था। पक जाने पर फसलों को काट कर खेतों से बाहर लाया जाता था और उनसे दाने निकालने का कार्य किया जाता था। फसलों को विशिष्ट प्रक्रिया से पीट कर दाने निकालने तक का कार्य कृषक की उत्पादक गतिविधि का महत्त्वपूर्ण अंग था। आज के युग में यह कार्य आधुनिक मशीनों द्वारा किया जाता है जबकि मुगलकाल में यह प्राचीन काल से ही चली आ रही परम्परागत तकनीक द्वारा सम्पन्न होता था। कोल्हू से जुड़े गोल घेरे में घूमने वाले बैलों के पैरों तले अनाज की कटी फसल डाल दी जाती थी। बार-बार बैलों के द्वारा रौंदे जाने से अनाज के दोने पौधों से अलग हो जाते थे।

हल जोतने, बुवाई, निराई-गुड़ाई और वे सभी कृषि कार्य जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है, के अतिरिक्त ग्रंथ ‘‘दर-फने-फलाहत’में विस्तार से पौधों की कलमें बनाने की विधि का भी वर्णन किया है। स्पष्ट रूप से पौधों के नर और मादा अंगों की अवधारण या तो विकसित हो चुकी थी या सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में यहाँ पहुँच गई थी। अतएव एक प्रकार से यह आधुनिक कृषि विज्ञान के आरम्भ की स्थिति थी। सामान्यत: मुगलकाल का कृषक वर्ष में दो फसलें पैदा करता था, जिससे स्पष्ट होता है कि उस काल में फसल-चक्र व्यवस्था का प्रचलन था, यद्यपि यह भूमि की उर्वरता, स्थानीय पद्धति, सिंचाई साधनों एवं अन्य प्राकृतिक कारकों पर पूरी तरह निर्भर होता था।

‘आइने-ए-अकबरी’ में रवी और खरीफ की फसलों की तालिका, फसल परिवर्तन की अवधारणा को सिद्ध करती है। फसल चक्र के अनुरूप बोए गये क्षेत्र को ‘एक फसला’ तथा ‘दो फसला’ नामों से जाना जाता था जिसका विस्तृत विवरण हमें ‘टोडरमल्स मेंमोरेण्डम’ में मिलता है। दो से अधिक फसलें पैदा करने वाले कुछ क्षेत्रों का भी विवरण मिलता है। बंगाल के एक कृषि क्षेत्र में तीन-तीन फसलों क्रमश: चावल, तम्बाकू एवं कपास चक्र-क्रमानुसार उत्पादित किये जाते थे।

अनाज भण्डारण/संरक्षण की तकनीक

फसलों से दाने निकाल लेने के बाद उन्हें संग्रहित करके रखना भी महत्त्वपूर्ण था। अनाज भण्डारण का सामान्य तरीका गड्ढों या खत्तियों में रखने का था, जिससे अनाज को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखा जा सकता था। ये गड्ढे या खत्तियां सूखे स्थान पर बनाये जाते थे। इनकी ऊँचाई निर्माण में प्रयुक्त होने वाली मिट्टी की प्रकृति पर निर्भर थी। इनका निर्माण करते समय अंदर कुछ वनस्पतियाँ भस्म की जाती थीं, फिर अनाज को उसमें भर दिया जाता था। इसके पूर्व खत्तियों के किनारे और धरातल पर गेहूँ या जौ कि बालियाँ लगायी जाती थीं। गड्ढे में डाले गये अनाज को पुआल से ढक कर उसके ऊपर गड्ढे के बाहर निकाला हुआ लगभग 18 इंच ऊँचा मिट्टी का चबूतरा खड़ा किया जाता था जो मानसून से भी टक्कर लेता था।

 पानी की बौछार से क्षतिग्रस्त हो जाने पर उसे फिर गोबर-मिट्टी के मिश्रण से छोप दिया जाता था। इस प्रकार अनाज बिना क्षति के वर्षों सुरक्षित रह सकता था। अंदर इसके द्वारा उत्पन्न गर्मी कीटाणुओं को रोकती थी और चूहों तथा दीमकों को भी दूर रखती थी। कभी-कभी इन खत्तियों में अनाजों के बीच नीम की पत्तियाँ भी रख दी जाती थीं जिनकी कीटाणुनाशक प्रकृति भी अनाज को सुरक्षित रखने में उपयोगी थी। अतएव तत्कालीन कृषिगत विशिष्टता के आधार पर भारतीय कृषि में प्रगति का स्पष्ट संकेत मिलता है। विपरीत परिस्थितियों में कार्य करते हुए भी भारतीय कृषक ने अपने अथक परिश्रम की पूँजी, परम्परागत तकनीक के साथ ही आधुनिक परिवर्तनों को भी स्वीकार किया, जिसके आधार पर तत्कालीन भारतीय कृषि को तकनीकी रूप से प्रभावी व वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित कहा जा सकता है।

विशेष रूप से सिंचाई के क्षेत्र में हुए महत्त्वपूर्ण आविष्कारों एवं उपकरणों आदि के विकास ने इस उद्यम को अत्यधिक लाभ पहुँचाया। इस काल में उल्लेखनीय कृषि प्रसार भी विविध स्रोतों से प्रमाणित होता है। तेरहवीं तथा चौदहवीं शताब्दी में गंगा के मैदान में स्थित एक विशाल वन क्षेत्र सोलहवीं शताब्दी के अंत तक कृषि अधीन भूमि में बदल गया था। अकबर के आधिपत्य में आया भक्खर भी कृषिगत तकनीक की प्रगति के फलस्वरूप ही उस काल में अत्यंत उपजाऊ विस्तृत कृषि क्षेत्र के रूप में विद्यमान था।

निष्कर्ष

इस अवधि में कुछ नई फसलें पैदा किया जाना पुरानी फसलों की किस्में बढ़ना भी कृषि की गुणवत्तापूर्ण प्रगति का महत्त्वपूर्ण सूचक था। अतएव कुल मिलाकर यह कृषिगत तकनीक के साथ-साथ आर्थिक पहलुओं में भी प्रभावशाली प्रगति के रूप में माना जायेगा।

 मुगलों कीआर्थिक व्यवस्थाः उद्योग धंधे,व्यापार एवं वाणिज्य

भारत में मनसबदारी व्यवस्था का प्रारंभ अकबर ने किया था। मुगल साम्राज्य में भूमिदान क्या थाः जागीर,मदद-ए-माश, ऐम्मा, वक्फ, खालसा, अलतमगा

मुगलों की भू राजस्व प्रणाली

मुगल कालीन आर्थिक जीवन की विस्तृत जानकारी आइने-अकबरी तथा विदेशी लेखकों के संस्मरणों से प्राप्त होती है। कृषि उत्पाद- आइने अकबरी में रबी ( बसंत ) की 16 फसलों तथा खरीफ (शरद ऋतु ) की 25 फसलों से प्राप्त होने वाले राजस्व का विस्तृत उल्लेख मिलता है। मुगल काल में खाद्य पदार्थों में – गेहूँ,बाजरा और दाल ( दाल को पलसेती अथवा दिलेत खिचङी कहा जाता था) प्रमुख थे। मुगल काल में आगरा के निकट बयाना तथा गुजरात में सरखेज से सर्वोत्तम किस्म की नील पैदा की जाती थी। इसका विशद् वर्णन पेलसार्ट ने किया है। भारत में तंबाकू 1604ई. के अंत अथवा 1605ई. के आरंभ में ( अकबर के काल) पुर्तगालियों द्वारा लायी गयी। संभवतः इसी के आस-पास मक्का अमरीका से भारत लाया गया। खेती के विस्तार तथा बेहतरी के लिए मुगल बादशाहों ने किसानों को बढावा दिया और इसके लिए तकाबी नामक ऋण भी वितरित किया।

मुगलकाल में नयी भूमि को खेती योग्य बनाने के लिए वनकटी(जंगलों को साफ कर जमीन को खेती योग्य बनाना) नामक एक तरीका अपनाया गया जिससे अधिकर से अधिक भूमि को कृषि योग्य बनाया जा सके। शाहजहाँ के शासन काल में 1630-32ई . में दक्कन तथा गुजरात में एक भयानक अकाल पङा था जिसके फसल्वरूप उसने खालिसा भूमि के भू-राजस्व का 70लाख रुपये माफ कर दिया था यह मुगल काल का प्रचंडतम अकाल था। शाहजहाँ ने अकाल से निपटने के लिए सिंचाई की सुवधा की व्यवस्था की उसने 98मील लंबी रावी नहर लाहौर तक बनवायी जिसे नहर-ए-फैज कहा जाता था।

इसके अतिरिक्त शाहजहाँ ने एक दूसरी नहर नहर – ए- साहिब ( जिसे फिरोज तुगलक ने बनवाया था ) को न केवल ठीक ही करवाया बल्कि उसका नाम नहर-ए- शाह भी रखा।

मुगलकाल में गन्ना,कपास,नील तथा रेशम आदि फसलों का भी उत्पादन होता था इन्हें तिजारती (नकदी)तथा उत्तम फसलें कहा जाता था। इन फसलों पर अधिक दर पर मालगुजारी नकद रूप में अदा करनी होती थी इसलिए इन्हें नकदी फसलें भी कहा जाता था।

कृषक वर्गमुगलकालीन कृषक वर्ग स्पष्ट रूप से तीन वर्गों में विभाजित था-

1.) खुदकाश्त,2.)पाहीकाश्त,3.)मुजारियान।

खुदकाश्तखुदकाश्त किसान वे खेतिहर होते थे जो उसी गांव की भूमि पर खेती करते थे,जिसके वे निवासी होते थे।इन्हें अपनी भूमि पर स्थायी एवं वंशानुगत स्वामित्व प्राप्त होता था। खुदकाश्त को अपनी भूमि को बंटाई पर देने का तथा बेचने का अधिकार होता था।इन्हें मालिक-ए-जमीन भी कहा जाता था। यदि किसान खुदकाश्त की जमीन पर बीज आदि का प्रबंध स्वयं करता था,तो उसे खुदकाश्त को उपज का 1/3 भाग लगान के रूप में देना पङता था क्योंकि खुदकाश्त स्वयं इन सारी चीजों की व्यवस्था करता था तो किसान को उसे उपज का 2/3 भाग देना पङता था।

पाहीकाश्त (पैकाश्त) : वे किसान होते थे,जो दूसरे गांवों में अस्थायी रूप से जाकर बंटाईदार के रूप में खेती करते थे। पाहीकाश्त के अधिकार में केवल उतनी ही भूमि होती थी,जितने पर अपने परिवार के श्रम का उपयोग करके खेती कर सकता था।

मुजारियान : इन कृषकों के पास इतनी कम भूमि होती थी कि वे उस भूमि में अपने परिवार के कुल श्रम का भी उपयोग नहीं कर पाते थे।फलस्वरूप वे खुदकाश्त की जमीन को किराये (बंटाई)पर लेकर उस पर खेती करते थे।

मुजारियान किसान अपनी जोत को बेच नहीं सकता था और न ही उसे रेहन रख सकता था।

मुजारियान तथा पाहीकाश्त में यह अंतर होता था कि पर्याप्त भूमि प्राप्त होने तथा नजराना देने पर पाहीकाश्त खुदकाश्त तो बन सकता था,किन्तु मुजारियान अपनी वर्तमान स्थिति(बटाईदार) से ऊपर नहीं उठ सकता था।

उद्योग धंधे : मुगल काल में सूती वस्र उद्योग सबसे अधिक उन्नत उद्योग था। जिस पर सरकार का पूरा नियंत्रण रहता था। यह एक मात्र ऐसी वस्तु थी जिसका विदेशों में सबसे अधिक निर्यात होता था।भारत में निर्मित कपङों को केलीको कहा जाता था। जहाँगीर ने अमृतसर में ऊनी वस्रोद्योग को प्रारंभ किया। चमङे की वस्तुओं को बनाने का उद्योग भी बहुत उन्नत अवस्था में था। कुछ अन्यु उद्योगों के नाम इस प्रकार थे- गुङ और चीनी- बंगाल,गुजरात और पंजाब। मिट्टी के बर्तन- दिल्ली,बनारस और चुनार। रेशम उद्योग- आगरा,लाहौर,दिल्ली,ढाका और बंगाल । फिर भी रेशमी कपङा विदेशों से मंगाया जाता था।रेशमी कपङों को पटोला कहा जाता था। तांबे की खाने राजस्थान एवं मध्यभारत में थी। हीरा गोलकुंडा और छोटा नागपुर की खानों से प्राप्त होता था।विश्वप्रसिद्ध कोहिनूर हीरा गोलकुंडा की खान से प्राप्त हुआ था।जिसे मीर जुमला (मुहम्मद सैयद) ने शाहजहाँ को भेंट किया।

इत्र,( अस्मत बेगम द्वारा आविष्कृत ) सुगंधित तेल तथा गुलाब-जल जैसी वस्तुओं के उत्पादन में जौनपुर और गुजरात प्रसिद्ध थे। समुद्री जहाजों का निर्माण मुगल काल में बहुत उन्नत अवस्था में नहीं था। अकबर ने इसके निर्माण के लिए एक पृथक विभाग स्थापित किया। किन्तु औरंगजेब ने अबीसीनियायियों तथा जंजीरा के सीदियों की सहायता से एक नौसेना तैयार की थी।

व्यापार एवं वाणिज्यमुगल काल में थोक-व्यापारियों को सेठ,बोहरा एवं मोदी कहा जाता था, जबकि खुदरा व्यापारियों को – व्या पारी व वानिक कहा जाता था। दक्षिण भारत में चेट्टी व्यापारिक समुदाय के प्रमुख अंग थे। मुगल काल में वस्तुविनियम का माध्यम – हुण्डी ( एक प्रकार का अल्पकालिक ऋण-पत्र) था। यह वह चिट्ठी होती थी जिसका भुगतान एक निश्चित अवधि के बाद कुछ कटौती करके दिया जाता था। सर्राफ रूपये के लेन-देन का विशेषज्ञ होता था यह हुण्डी का भी काम करता था इस प्रकार वह एक नीजी बैंक की तरह कार्य करता था।

मुगलकाल में सामान्यतः चुंगी की दर प्रारंभ में वस्तु के मूल्य का ढाई प्रतिशत होती थी किन्तु बाद में इसे बढाकर साढे तीन प्रतिशत कर दिया गया। औरंगजेब के काल में हिन्दू व्यापारियों से वस्तु के मूल्य का 5 प्रतिशत तथा मुसलमान व्यापारियों से ढाई प्रतिशत लिया जाने लगा। विरजी बोहरा सूरत का प्रसिद्ध व्यापारी था। कई दशकों तक सूरत के व्यापार पर उसका एकाधिपत्य रहा उसके पास एक विशाल जहाजी बेङा था वह अपने समय के सबसे अधिक धनी लोगों में गिना जाने लगा। नाखुदा नामक व्यापारी जहाज मालिक के एजेन्ट के रूप में काम करते थे। विरजी बोहरा के अतिरिक्त इस काल के कुछ अन्य प्रमुख व्यापारी थे- सूरत के अब्दुल गफूर और अहमद चैलाबी गोलकुंडा के मीरजुमला तथा कोरोमंडल तट के मलयचेट्टी , काशी वीरन्ना तथा सुनका राम चेट्टी। अठारहवीं शताब्दी में बंगाल एवं गुजरात मे ऋण प्रदान करने की एक नयी व्यवस्था शुरू हुई। जिसे ददनी (अग्रिम संविदा एवं पेशगी) कहा जाता था।इसके अंतर्गत दस्तकारों ( जुलाहों ) को अग्रिम पेशगी देकर एक करार कर लिया जाता था। अकबर ने आंतरिक व्यापार पर लगने वाले राहदरी शुल्क को समाप्त कर दिया।

मुगल काल में प्रारंभ में निर्यात की मुख्य वस्तु : नील,शोरा,अफीम एवं सूती वस्र था जबकि मुख्य आयात सोना,चाँदी,घोङा,कच्चा रेशम आदि वस्तुओं का होता था। मुगलकाल में सबसे अच्छी नील गुजरात में सरखेज तथा बयाना से पैदा होती थी। शोरा मुख्यतः कोरोमंडल तट तथा बिहार से उत्पादित किया जाता था।

मुगल काल में सोने,चाँदी का आयात इतना बढ गया ता कि बर्नियर ने टिप्पणी करते हुए कहा कि विश्व के प्रत्येक भागों में चक्कर लगाने के बाद सोना,चाँदी अंत में भारत में जो सोने,चाँदी की दलदल है,उसमें दफन हो जाता था। मुगल अमीरों को राज्य की ओर से दिये जाने वाले ऋण को मुसादात कहा जाता था। मुगल काल में जो व्यापारी किसी गाँव में व्यापार के उद्देश्य से अस्थायी रूप से रहते थे वे बिछैती या बछायत कहलाते थे और जो गाँव तक ही अपना व्यापार सीमित रखते थे वे सहथानी कहलाते थे। ये मुख्यतः अनाज का व्यापार करते थे। समुद्री व्यापार में लगे मुस्लिम व्यापारियों में खोजा और वोहरा प्रमुख थे। मध्यम कोटि के व्यापारियों में बालासोर के खेमचंद एवं हुगली के मथुरादास प्रमुख थे जो ईस्ट इंडिया कंपनी के एजेन्ट के रूप में कार्य करते थे। 17वी. शताब्दी में मारवाङी साहूकार – हीरानंद साहू का नाम उल्लेखनीय है जो आमेर से आकर बिहार में मानसिंह का साहूकार बन गया था।उसी का पुत्र प्रसिद्ध जगत सेठ- मानिक चंद तथा मुर्शिद कुली खाँ का साहूकार था। उत्तर -पश्चिमी सीमा क्षेत्र में बहने वाली नदियों में विशेषकर सिन्धु नदी में नौका चालन के सर्वाधिक उदाहरण मिलते हैं।

उत्तरपश्चिम में निर्यात के लिए दो स्थल मार्ग मुख्य थे

1. लाहौर से काबुल तथा 2. मुल्तान से कंधार।

मुगल बादशाह सभी आयातों एवं निर्यातों पर साढे तीन प्रतिशत तथा सोने और चाँदी पर दो प्रतिशत चुंगी लेते थे। सूरत के सभी मालों क आयात-निर्यात पर साढे तीन प्रतिशत चुंगी ली जाती थी।

मुग़लकालीन राजस्व प्रणाली

मुग़लकालीन शासन व्यवस्था में राजस्व के स्रोत मुख्यतः दो भागों में बँटे थे- ‘केन्द्रीय’ एवं ‘स्थानीय’। केन्द्रीय आय के कई महत्त्वपूर्ण स्रोत थे, जिनमें भू-राजस्व, चुंगी, टकसाल , उत्तराधिकारी के अभाव में प्राप्त आय, उपहार, नमक पर कर एवं प्रत्येक व्यक्ति पर लगने वाला पॉल-टैक्स या व्यक्ति कर शामिल था। इन सबमें ‘भू-राजस्व’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत था। वास्तविक कृषि उत्पाद या फ़सल में राज्य के अंश को ‘माल’ या ‘ख़राज’ (लगान, भूमिकर, चौथ) के रूप में अभिहित किया जाता था।

भूमि का विभाजन

भूमि कर के विभाजन के आधार पर मुग़ल साम्राज्य की समस्त भूमि तीन वर्गों में विभक्त थी-

  • खालसा भूमि
  • जागीर भूमि
  • सयूरगल भूमि।

खालसा भूमि

प्रत्यक्ष रूप में बादशाह के अधिकार क्षेत्र में रहने वाली ‘खालसा भूमि’ से प्राप्त आय शाही कोष में जमा कर दी जाती थी। इस आय का उपयोग व्यक्तिगत ख़र्च पर (शाही परिवार), राजा के अंगरक्षक एवं निजी सैनिक पर, युद्ध की तैयारी आदि पर किया जाता था। सम्पूर्ण साम्राज्य का लगभग 20 प्रतिशत क्षेत्र खालसा भूमि के अन्तर्गत शामिल था। 1573 ई. में अकबर ने जागीर भूमि को कम करके खालसा भूमि के विस्तार का निर्णय लिया। जहाँगीर ने खालसा भूमि का आकार कम कर दिया था, पर शाहजहाँ ने इसका पुनः विस्तार किया। औरंगज़ेब के शासन काल के अन्तिम दिनों में खालसा भू-क्षेत्रों को जागीरों के रूप आवंटित किया जाने लगा।

जागीर भूमि

यह भूमि राज्य के प्रमुख कर्मचारियों को उनकी तनख़्वाह के बदले दी जाती थी। जब इस भूमि का केन्द्र के निरीक्षण में हस्तांतरण होता था, तब इसे ‘पायबाकी’ कहा जाता था। भूमि प्राप्त करने वाले को भूमि से कर वसूलने का भी अधिकार मिला रहता था। पदमुक्त होने पर इस भूमि पर से उस व्यक्ति का अधिकार जागीरदारों के हाथों में चला जाता था। जागीरदारों पर नियंत्रण रखने के लिए ‘सावानिहनिगार’ नामक विभाग होता था, जो जागीरदारों की कार्यवाही एवं अन्य विवरण केन्द्र को भेजता था।

सयूरगल भूमि

इस प्रकार की भूमि को ‘मदद-ए-माश’ भी कहा जाता था। यह भूमि अनुदान के रूप में धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्तियों को दी जाती थी। इस तरह की अधिकांश भूमि अनुत्पादक होती थी। इस भूमि को ‘मिल्क’ भी कहा जाता था। जहाँगीर ने ‘अलतमगा’ जागीर अनुदान में प्रदान की थी। यह जागीर वंशानुगत होती थी। ‘एम्मा जागीरें’ मुसलमान धर्मविदों और उलेमाओं को प्रदान की जाती थी।

मुगलकालीन केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था

मुगलों का राजत्व सिद्धांत मुगलों के राजस्व सिद्धांत का मूलाधार शरिअत (कुरान एवं हदीस का सम्मलित नाम) था। बाबर ने राजत्व संबंधी विचार प्रकट करते हुए कहा है कि- बादशाही से बढकर कोई बंधन नहीं है। बादशाह के लिए एकांतवास या आलसी जीवन उचित नहीं है। बाबर ने बादशाह की उपाधि धारण करके मुगल बादशाहों को खलीफा के नाममात्र के आधिपत्य से भी मुक्त कर दिया। अब वे किसी विदेशी सत्ता अथवा व्यक्ति के अधीन नहीं रह गये।

हुमायूँ बादशाह को पृथ्वी पर खुदा का प्रतिनिधि मानता था।उसके अनुसार सम्राट अपनी प्रजा की उसी प्रकार रक्षा करता है जिस प्रकार ईश्वर पृथ्वी के समस्त प्राणियों की रक्षा करता है। अकबर कालीन मुगल राजत्व सिद्धांत की स्पष्ट व्याख्या अबुल फजल ने आइने-अकबरी में की है। अबुल फजल ने अकबर कालीन राजत्व का विवेचन करते हुए लिखा है कि- राजत्व ईश्वर का अनुग्रह है यह उसी व्यक्ति को प्राप्त होता है जिस व्यक्ति में हजारों गुण एक साथ विद्यमान हों। अबुल फजल के अनुसार राजसत्ता परमात्मा से फूटने वाला तेज और विश्व प्रकाशक सूर्य की एक किरण है।

अकबर राजतंत्र को धर्म एवं संप्रदाय से ऊपर मानता था और उसने रुढिवादी इस्लामी सिद्धांत के स्थान पर सुलह कुल की नीति अपनायी। जबकि

औरंगजेब ने राजतंत्र को इस्लाम का अनुचर बना दिया।औरंगजेब यद्यपि भारत में परंपरागत रूप से चल रहे मुस्लिम कानून की हनफी विचारधारा का परिपोषक था फिर भी उसने जबावित जैसे धर्म निरपेक्ष आज्ञप्तियाँ(राजाज्ञायें) जारी करने में कोई संकोच नहीं किया। क्योंकि जबावित सैद्धांतिक रूप से शरियत की पूरक थी। मुगल बादशाहों ने निःसंदेह बादशाह के दो कर्तव्य माने थे- जहाँबानी (राज्य की रक्षा) और जहाँगीरी (अन्य राज्यों पर अधिकार) ।

अबुल फजल ने जिस राजत्व सिद्धांत का समर्थन किया है उसके अनुसार- बादशाह ईश्वर का प्रतिनिधि तथा पृथ्वी पर ईश्वर का दूत होता है और ईश्वर ने उसे साधारण मानव की अपेक्षा अधिक बुद्धि और विवेक प्रदान किया है।

मुगल प्रशासन का स्वरूप (केन्द्रीय शासन)-

मुगल शासन सैन्य शक्ति पर आधारित एक केन्द्रीय व्यवस्था थी, जो नियंत्रण एवं संतुलन पर आधारित थी। मुगल प्रशासन भारतीय तथा गैर – भारतीय (विदेशी) तत्वों का सम्मिश्रण था। दूसरे शब्दों में कहें तो यह भारतीय पृष्ठभूमि में अरबी -फारसी पद्धति थी। मुगल कालीन प्रशासन में अधिकार का बंटवारा-सूबेदार और दीवान के बीच-मिस्र के शासकों द्वारा अपनाई गई प्रणाली पर आधारित था, राजस्व प्रणाली की दो पद्धतियाँ थी – अति प्राचीन – जो अरबी सिद्धांतों का परिणाम थी। जबकि मनसबदारी व्यवस्था-जो मध्य एशिया से ग्रहण की गयी थी। मुगल साम्राज्य चूंकि पूर्णतः केन्द्रीकृत था इसलिए बादशाह की शक्ति असीम होती थी। फिर भी प्रशासन की गतिविधियों को चलाने के लिए एक मंत्रिपरिषद होती थी। मंत्रिपरिषद के लिए विजारत शब्द का प्रयोग किया गया है।

वजीर (वकील)

बाबर और हुमायूँ के समय में वजीर का पद बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण था। यह साम्राज्य का प्रधानमंत्री होता था। इसे सैनिक तथा असैनिक दोनों मामलों में असीमित अधिकार प्राप्त थे। अकबर के काल में मुगल प्रधानमंत्री को वकील कहा जाने लगा। अकबर के शासन काल के आरंभिक वर्षों में बैरम खाँ ने वकील के रूप में अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया था। इसलिए अकबर ने बैरम खाँ के पतन के बाद अपने शासनकाल के 8वें वर्ष एक नया पद दीवान-ए-वजारत-ए-कुल की स्थापना की। जिसे राजस्व एवं वित्तीय मामलों के प्रबंध का अधिकार प्रदान किया गया। धीरे-धीरे अकबर ने वकील के एकाधिकार को समाप्त कर उसके अधिकारों को – दीवान, मीरबख्शी तथा मीर-सांगा और सद्र-उस-सुदूर में बांट दिया।उसके बाद से यह पद केवल सम्मान का पद रह गया जो शाहजहां के समय तक चलता रहा। अकबर के काल में केवल चार ही मंत्रिपरिषद थे

  • वकील,
  • दीवान( अथवा वजीर)   
  • मीर बख्शी       
  • सद्र

दीवान

काल के 8वें वर्ष वकील के एकाधिकार को समाप्त कर करने के लिए किया था। इसे वजीर भी कहा जाता था। यह वित्त एवं राजस्व का सर्वोच्च अधिकारी होता था।

वित्त एवं राजस्व के अतिरिक्त अन्य सभी विभागों पर भी उसका प्रभाव होता था। सम्राट की अनुपस्थिति में वह शासन के साधारण कार्यों को बादशाह की ओर से देखता था। इस प्रकार वह एक तरह से सम्राट और शेष अधिकारियों के बीच की कङी था।

दीवान भी वकील की तरह शक्तिशाली न हो जाय इसलिए अकबर उसे स्थानांन्तरित करता था।मुगल बादशाह इन अधिकारियों की नियुक्ति योग्यता पर करते थे, न कि सैनिक योग्यता पर।

मुगल बादशाहों के काल में – मुजफ्फर खाँ तुरबती, राजा टोडरमल, एवाजशाह मंसूर (सभी अकबर कालीन) , ऐतमुदुद्दौला (जहाँगीर), सादुल्ला खाँ ( शाहजहाँ कालीन ) और असद खाँ ( औरंगजेब कालीन) आदि योग्यतम् दीवान थे। दीवान वित्तमंत्री होने के बावजूद अपनी इच्छा से धन व जागीर नहीं दे सकता था। किन्तु वह खालिसा, जागीर और इनाम आदि जमीनों का केन्द्रीय अधिकारी होता था।

दीवान की सहायता के लिए अनेक अन्य अधिकारी भी होते थे- दीवाने खालिसा (शाही भूमि की देखभाल करने वाला अधिकारी), दीवान-ए-तन ( वेतन तथा जागीरों की देखभाल करने वाला) मुल्तौफी (आय-व्यय का निरीक्षक) तथा मुशरिफ।

मीर बख्शी

मीर बख्शी सैन्य विभाग का सर्वोच्च अधिकारी होता था। इस पद का विकास अकबर के काल में शुरू हुआ था। मीर बख्शी के प्रमुख कार्य- सैनिकों की भर्ती, उसका हुलिया रखना, रसद प्रबंध, सेना में अनुशासन रखना, सैनिकों के लिए हथियारों तथा हाथी – घोङों का प्रबंध रखना। इसके अतिरिक्त वह शाही महल की सुरक्षा का उत्तरदायित्व भी वहन करता था। मुगल काल में मीर बख्शी सैन्यमंत्री होने पर भी वह न तो सेनानायक होता था और न ही स्थायी वेतन भोगी अधिकारी होता था। मीरबख्शी युद्ध के दौरान छोङकर बाकी सेना को वेतन बाँटने का कोई अधिकार नहीं रखता था, सामान्यतः यह अधिकार दीवाने – तन को होता था।

मीर बख्शी के द्वारा सरखत नामक पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद ही सेना का मासिक वेतन निर्धारित होता था। मुगलकाल में बख्शियों की कोई संख्या निश्चित नहीं होती थी। औरंगजेब के शासनकाल के अंतिम दौर में मुगल साम्राज्य का अधिक विस्तार हो जाने के कारण 4 बख्शियों को नियुक्त करना पङा था। मीरबख्शी स्वयं उच्च श्रेणी का मनसबदार होता था और वह मनसबदारी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए उत्तरदायी होता था। मीर बख्शी के दो अन्य सहायक – बख्शिये- हुजूर तथा बख्शिये – शाहिगिर्द पेशा होते थे। प्रांतों में वाकयानवीस मीर बख्शी को सीधे सूचना देते थे।

मीरसाँमा

अकबर ने अपने शासनकाल में इस विभाग की भी स्थापना की थी। मीर-ए-साँमा घरेलू मामलों का प्रधान होता था। वह सम्राट के परिवार, महल तथा उसकी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता था। यह पद बहुत ही विश्वासी व्यक्ति को दिया जाता था। मीर-ए-साँमा के पास साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले कारखानों के संगठन और प्रबंध का स्वतंत्र प्रभार होता था। उसके अंतर्गत आने वाले अन्य अधिकारी थे- दीवाने-बयूतात, मुशरिफ, दरोगा, और तहवीलदार।

मीर-ए-साँमा अकबर के समय में मंत्री पद नहीं था। किन्तु बाद में इसे मंत्री पद बना दिया गया और यह इतना महत्त्वपूर्ण हो गया कि इसे वजीर का पद प्राप्त करने की अंतिम सीढी माना जाने लगा। अंतःपुर के सभी महत्त्वपूर्ण एवं गोपनीय कार्य दरोगा के हाथों संपन्न होते थे।  दस्तूर-उल-अमल में मीर-ए-साँमा को व्यय का अधिकारी कहा गया है। शाहजहाँ के काल तक इस अधिकारी को मीर-ए-साँमा कहा जाता था। किन्तु औरंगजेब के काल में इसे खाने-साँमा कहा जाने लगा।

सद्रउससुदूर(सद्रकुल)-

यह धार्मिक मामलों में बादशाह का सलाहकार होता था। उसका प्रमुख कार्य- दान-पुण्य की व्यवस्था करना,धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था करना, विद्वानों को कर मुक्त – भूमि एवं वजीफा प्रदान करना तथा इस्लामी कानूनों के पालन की समुचित व्यवस्था करना था। सद्र-उस-सुदूर के शेख-उल-इस्लाम भी कहा जाता था। सद्र-उस-सूदूर को कभी-2 मुख्य काजी का भी पद दिया जाता था। अर्थात् जब वह न्याय विभाग के प्रमुख के रूप में कार्य करता था तब उसे काजी-उल-कुजात कहा जाता था। अकबर के समय में अधिकांशतया यह पद पृथक -2 व्यक्ति को प्रदान किया जाता था। सद्र – उस- सुदूर बादशाहों या शहजादों द्वारा धार्मिक व्यक्तियों, विद्वानों तथा महंथों को दी गयी कर – मुक्त भूमि की देखभाल करता था तथा उससे संबंधित मुकदमों का फैसला भी करता था।

अकबर के समय में सद्र पद का महत्व इसलिए कुछ कम हो गया था क्योंकि अकबर धार्मिक मामलों में इनकी सला ह नहीं लेता था। बल्कि उसने जागीर और वजीफे देने का अधिकार अपने हाथ में स्वयं ले लिया था। जहाँगीर के शासन काल तक सद्र पद अपना अधिकांश प्रभाव खो चुका था। बाद में इस पद को वह सम्मान और अधिकार कभी प्राप्त न हो सका। मुगलकाल के अन्य अधिकारियों के विपरीत सद्र का स्थानान्तरण नहीं होता था। सद्र द्वारा जीविकोपार्जन हेतु दी जाने वाली नकदी को वजीफा तथा कर-मुक्त भूमि को सयूरगल या मदद-ए-माश कहा जाता था। 1578ई. में प्रांतों में भी सद्र नियुक्त किये जाने लगे, जिससे केन्द्रीय सद्र का एकाधिकार समाप्त हो गया।

साधारणतया सद्र को उनके वेतन के एवज में कर-मुक्त भूमि दी जाती थी। वे मनसबदार नहीं होते थे। किन्तु कुछ ऐसे उदाहरण भी हैं, जब उन्हें मनसब दिया गया। जैसे- अकबर के काल में सद्रे-जहां को अकबर ने दो हजार का मनसब एवं जहाँगीर ने उसे ही चार हजार और बाद में पाँच हजार का मनसब दिया।

इसी प्रकार शाहजहाँ के काल में मुसब्बी खाँ को तीन हजार का मनसब तथा सैय्यद जलाल को औरंगजेब ने छः हजार का मनसब दिया था। मुगलकाल का सर्वप्रथम सद्र शेखगदाई था, जिसे बैरम खाँ ने अपने संरक्षण काल में बनवाया था।अकबर ने अपने शासनकाल में दरिद्रों एवं अनाथों को मुफ्त भोजन देने के लिए धर्मपुरा ( हिन्दुओं के लिए ) जोगीपुरा (जोगियाों के लिए) तथा खैरपुरा ( मुसलमानों तथा अन्य के लिए) नाम के तीन दरिद्रालय खुलवाये और जिनकी देखरेख का उत्तरदायित्व अबुल फजल को दिया था।

अन्य उच्च अधिकारी

मुहतसिब (सार्वजनिक आचार नियंत्रक)  : प्रजा के नैतिक चरित्र की देखभाल करने के लिए औरंगजेब ने मुहतसिबों की नियुक्ति की थी। मुहतसिबों का मुख्य कार्य शरियत के प्रतिकूल काम करने वालों को रोकना तथा आम जनता को दुश्चरित्रता से बचाना था। किन्तु कभी-2 उसे माप-तौल के पैमाने की देखभाल करना तथा वस्तुओं के मूल्यों को निश्चित करने का उत्तरदायित्व भी दिया जाता था। औरंगजेब के समय में हिन्दू मंदिरों और पाठशालाओं को तोङने का उत्तरदायित्व मुहतसिबों को सौंपा था।

मुख्यकाजी(काजीउलकुजात)  : मुगल बादशाह सभी मुकदमों का निर्णय स्वयं नहीं कर सकते थे इसलिए उन्होंने राजधानी में एक मुख्य काजी ( मुख्य न्यायाधीश ) नियुक्त किया, जो मुस्लिम कानून के अनुसार न्याय करता था। मुख्य काजी की सहायता के लिए मुफ्ती नियुक्त होते थे, जो कानून की व्याख्या करते थे और उसी के आधार पर मुख्यकाजी निर्णय देता था। मुगलकालीन प्रांतीय शासन व्यवस्था

मुगलों का प्रांतीय शासन केन्द्रीय शासन का ही प्रतिरूप था। प्रशासन की दृष्टि से मुगल साम्राज्य को सूबों (प्रांतों)में, सूबों को सरकारों (जिलों)में, सरकारों को परगनों (महालों) में तथा परगनों को गाँवों में बांटा गया था।

बाबर और हुमायूँ के शासन काल में मुगल प्रदेशों के प्रशासनिक मंडल सूबों की अपेक्षा जिले (सरकार)में विभक्त थे। शेरशाह ने भी प्रांतों को समुचित रूप से संगठित नहीं किया था। सर्वप्रथम अकबर ने ही प्रांतीय प्रशासन के लिए एक नया और विस्तृत आधार प्रस्तुत किया । सर्वप्रथम अकबर ने 1580ई. में अपने संपूर्ण साम्राज्य को 12 सूबों में विभाजित किया, किन्तु शासनकाल के अंतिम समय में दक्षिण भारत के बरार, खानदेश एव अहमदनगर की विजय के पश्चात सूबों का ही वर्णन किया है। किन्तु अबुल फजल ने अपने आइने-अकबरी में केवल 12सूबों का ही वर्णन किया है।

जहाँगीर ने कांगङा विजय करके उसे लाहौर सूबे में मिला लिया, जो पहले से ही एक सूबा था। इसलिए उसके समय में सूबों की संख्या पूर्ववत् रही।

शाहजहाँ ने कश्मीर, थट्टा और उङीसा को ( जो अकबर के समय में क्रमशः लाहौर,मुल्तान एवं बंगाल सूबों में सलित थे) स्वतंत्र सूबा बना दिया।जिससे उसके काल में सूबों की संख्या बढकर 18 हो गई। शाहजहाँ ने 1633ई . में अहमदनगर को पूर्णतःजीतकर साम्राज्य में मिलाया।किन्तु उसे कोई नया सूबा नहीं बनाया क्योंकि अकबर के काल में ही अहमदनगर एक सूबा बन चुका था। औरंगजेब द्वारा बीजापुर(1686) एवं गोलकुण्डा (1687)को जीतकर साम्राज्य में मिलाने से सूबों की संख्या बढकर 20 हो गयी।

सूबेदार

अकबर के काल में प्रांतीय प्रशासन के प्रमुख अधिकारी को सरकारी तौर पर सिपहसालार (गवर्नर) कहा जाता था, जिसे उसके उत्तराधिकारियों के समय में – नाजिम या सूबा-साहब कहा जाने लगा।परंतु जनसाधारण में वह सूबेदार, सूबा-साहब या केवल सूबा के नाम से जाना जाता था। सूबेदार को सूबे के संपूर्ण सैनिक एवं असैनिक अधिकार प्राप्त थे। सूबेदार का स्थानान्तरण आवश्यकता पङने पर होता रहता था। 1586 ई. में अकबर ने सूबों में एक नया परिवर्तन करते हुए एक नया दीवान पद सृजित कर दिया जो सूबेदारों की शक्ति पर नियंत्रण रखता था। सूबेदारों (गवर्नर) को किसी भी जागीरदार या अधिकारी को अपनी स्पष्ट आज्ञा का उल्लंघन करने पर उसे दंडित करने का अधिकार था,किन्तु वह केन्द्र से सीधा संबंध रखने वाले किसी भी शहजादे को दंडित नहीं कर सकता था। मुगल काल में गवर्नर ( सूबेदार) टोडरमल को मात्र राजपूतों से संधियां करने तथा उन्हें मनसब प्रदान करने का अधिकार प्रदान किया था।

प्रांतीय दीवान

प्रांतीय दीवान(दीवाने सूबा) सूबे ( प्रांत ) का वित्त अधिकारी होता था यद्यपि वह ओहदे में सूबेदार (गवर्नर) से नीचे होता था, किन्तु वह सूबेदार का मातहत नहीं होता था। वह सीधे शाही दीवान के प्रति उत्तरदायी होता था।

दीवान सूबे में वित्त एवं राजस्व का प्रमुख होता था जबकि सूबेदार कार्यकारिणी का प्रमुख होता था। दीवान-ए-सूबा का प्रमुख कार्य भू राजस्व एवं अन्य करों की वसूली करना, आय-व्यय का हिसाब रखाना, सूबे की आर्थिक स्थिति की सूचना केन्द्रीय सरकार को देने के साथ-2 दीवानी (धन अथवा लगान संबंधी) मुकदमों का निर्णय करना था।इस प्रकार दीवान और सूबेदार एक दूसरे के नियंत्रण रखते थे।प्रांतों के शासनाधिकार का यह विभाजन मिस्र की सरकार की अरबी व्यवस्था से मिलता जुलता था।

बख्शी

बख्शी की नियुक्ति केन्द्रीय मीर बख्शी के अनुरोध पर शाही दरबार द्वारा की जाती थी। बख्शी का मुख्य कार्य सूबे की सेना की देखभाल करना था, प्रांतीय बख्शी को वाकिया निगार ( वाकिया नवीस ) के रूप में भी कार्य करना होता था। इस रूप में इसका कार्य सूबे की समस्त जानकारी केन्द्र को देना था। प्रांतीय बख्शी और केन्द्रीय मीरबख्शी में एक अंतर था कि प्रांतीय बख्शी सेना का वेतनाधिकारी होता था जबकि केन्द्रीय मीरबख्शी सेना का वेतनाधिकारी नहीं होता था। केन्द्र में यह काम दीवाने-तन करता था।

प्रांतीय गवर्नर एवं प्रांतीय दीवान के बीच टकराव हो जाने पर सूबों की समस्त जानकारी को केन्द्र सरकार तक भेजने के लिए संवाददाताओं की एक और टोली होती थी, जिसे सवानी-नवीस( खुफिया नवीस) कहा जाता था।वे गुप्त रूप से केन्द्र को सूबे की सूचनाएं उपलब्ध कराते थेऔर बाद में वे ही डाक -अधिकारी के रूप में भी काम करते थे।

प्रांतीय सद्र : प्रांतीय सद्र एवं प्रांतीय काजी का पद कभी-2 एक ही व्यक्ति को दे दिया जाता था। अतएव सद्र की दृष्टि से वह प्रजा के नैतिक चरित्र एवं इस्लाम धर्म के कानूनों के पालन की व्यवस्था करता था और काजी की दृष्टि से न्याय करता था। प्रांतीय सद्र अनुदानों में उत्तराधिकार या अन्य विवाद उठने पर उसका निपटारा भी करता था। उसे मीर-ए-अदल भी कहा जाता था। कोतवाल सूबे की राजधानी तथा बङे-2 नगरों में कानून एवं व्यवस्था की देखभाल करता था।

सरकार (जिले) का शासन          

मुगलकाल में सरकार (जिलों) में फौजदार,आमिल,कोतवाल और काजी इत्यादि महत्वपूर्ण अधिकारी होते थे।

फौजदार : मुगल काल में सरकार का मुख्य प्रशासक फौजदार होता था। इसका मुख्य कार्य -सरकार में कानून-व्यवस्था बनाये रखना तथा चोर-लुटेरों से जनता की रक्षा करना था।इसके अतिरिक्त उसे राजस्व उगाही में अमलगुजार की सहायता भी करनी पङती थी। शेरशाह के समय में इसे मुंसिफ-ए-मुंसिफान कहा जाता था।जो परगनों के मालगुजारी कर्मचारियों के कार्यों का निरीक्षण करता था।मुगल बादशाहों के समय में फौजदारों को न्यायिक अधिकार भी दिये जाते थे। औरंगजेब की मृत्यु के बाद लगभग फौजदारों का पद वंशानुगत हो गया।

अमलगुजार : आमिल या अमलगुजार सरकार का वित्त अधिकारी होता था।उसका कार्य-लगान वसूल करना तथा कृषि एवं किसानों दोनों की देखभाल करना था। वह खालिसा भूमि का राजस्व भी एकत्र करता था। इसके अतिरिक्त बह कोतवाल के न्यायिक कार्यों को भी करता था। कानून एवं सुरक्षा व्यवस्था तथा सफाई व्यवस्था जैसे कार्यों को नहीं करता था।

वितिक्ची : अमल गुजार के अधीन एक लिपिक होता था, उसे भूमि और लगान संबंधी कागजात तैयार करना होता था। जिसके आधार पर अमलगुजार लगान वसूल करता था। कोतवाल की नियुक्ति मीर-आतिश की सिफारिश पर केन्द्र सरकार द्वारा की जाती थी।उसका मुख्य कार्य नगर में शांति एवं सुरक्षा स्थापित करना, स्वच्छता एवं सफाई की व्यवस्था करना था। इसके अतिरिक्त उसे न्यायिक कार्य भी करना पङता था। कोतवाल की कचहरी को चबूतरा कहा जाता था, जहाँ वह शहर के विवादों से संबंधित न्यायिक कार्य करता था।वह नगर में घटने वाली समस्त घटनाओं के प्रति उत्तरदायी होता था।खजानदार सरकार (जिले) का खजांची होता था। इसका मुख्य कार्य- सरकारी खजाने की सुरक्षा करना था। यह अमलगुजार के अधीन रहता था। काजी-ए-सरकार- की नियुक्ति काजी-ए-सूबा की संस्तुति पर सद्र-उस-सुदूर द्वारा की जाती थी। न्यायाधिकारी का कार्य करने के कारण काजी को शरियत-पनाह की उपाधि भी दी जाती थी। औरंगजेब के शासनकाल में काजी जजिया एवं जकात करों की वसूली के लिए भी उत्तरदायी थी।

परगने का प्रशासन : प्रत्येक सरकार कई परगनों में बंटा होता था। परगने के प्रमुख अधिकारी शिकदार,आमिल,फोतदार, कानूनगो और कारकून होते थे।

शिकदार : यह परगने का प्रमुख अधिकारी होता था। उसका मुख्य कार्य – परगने में शांति व्यवस्था स्थापित करना तथा राजस्व वसूल करवाने में आमिल की मदद करना था।

आमिल : यह परगने का वित्त अधिकारी होता था किसानों से लगान वसूल करना उसका मुख्य कार्य होता था। अकबर ने अपने शासन काल के 18वें वर्ष प्रत्येक परगने (महाल)में, जिसकी मालगुजारी आय प्रतिवर्ष 1करोङ दाम (25000रु.) थी, एक आमिल नियुक्त किया। जिसे जनसाधारण में करोङी कहा जाता था। शाहजहाँ के शासन काल में प्रत्येक परगने में मालगुजारी निर्धारण के लिए एक परगना अमीन की नियुक्ति हुई। कानूनगो परगने के पटवारियों का प्रधान होता था। वह लगान एवं कृषि संबंधी सभी कागजातों को तैयार करता था। अबुल फजल के अनुसार- कानूनगो द्वारा वसूल किये गये लगान का 1 प्रतिशत जो उसे दस्तूरी के रूप में मिलता था नानकार कहा जाता था। कारकुन परगने के क्लर्क होते थे, जो लिखा-पढी का कार्य करते थे।इस प्रकार जिले(सरकार) में जो काम वितिक्ची का होता था परगने में वही कार्य कारकुन का होता था। अकबर के काल में परगने के अभिलेख केवल फारसी भाषा में ही लिखे जाते थे।

ग्राम प्रशासन : मुगल शासक गांव को एक स्वायत्त-संस्था मानते थे जिसके प्रशासन का उत्तरदायित्व मुगलों अधिकारियों को नहीं दिया जाता था।बल्कि परंपरागत ग्राम पंचायतें ही अपने गांव की सुरक्षा -सफाई एवं शिक्षा आदि की देखभाल करती थी। गांव का मुख्य अधिकारी ग्राम प्रधान होता था जिसे खुत, मुकद्दम या चौधरी कहा जाता था। उसकी सहायता के लिए एक पटवारी होता था। मुगल काल में पटवारी को राजस्व का एक प्रतिशत दस्तूरी (कमीशन) के रूप में दिया जाता था। मुगल काल में परगनों के अंतर्गत आने वाले गांवों को मावदा या दीह कहा जाता था। मावदा या दीह के अंतर्गत आने वाली छोटी-2बस्तियों को नागला कहा जाता था। शाहजहाँ के शासन काल में परगना और सरकारों ( जिलों ) के बीच एक और ईकाई का निर्माण किया गया, जिसे – चकला कहा जाता था। जिसके अंतर्गत कुछ परगने आते थे। मुगल काल में बंदरगाहों के प्रशासन की देखभाल मुसद्दी नामक अधिकारी करता था। मुगल काल में कारखानों पर सरकारी अधिकारी होता था। इसके प्रशासन के लिए दीवाने-बयूतात नामक एक विभाग स्थापित किया गया था और इसका प्रमुख दीवान-ए-बयूतात होता था। मुगलशाही कारखानों में बनने वाली वस्तुओं में खिलअत्(खिल्लत) विशेष उल्लेखनीय थी।खिल्लत एक सम्मान की पोशाक होती थी,जिसे बादशाह विशेष अवसरों पर विशेष व्यक्तियों को प्रदान करता था। मुगल काल में पहली बार तोपों का प्रयोग बाबर ने भेरा के किले पर आक्रमण (1519ई.) को दौरान किया था।किन्तु दक्षिण भारत में पहली बार तोपों का प्रयोग विजयनगर के शासक बुक्का राय ने 1367ई. में बहमनी के विरुद्ध किया था।

मुगलकालीन सूबों की संख्या :

1. अकबर- आइने अकबरी के अनुसार अकबर के समय सूबों की संख्या 12 थी। वैसे अकबर के समय कुल सूबे 15 थे। 12पुराने सूबों में 3 नवीन सूबे जुङे जिनके नाम ये हैं- बरार,खानदेश एवं अहदनगर

2. जहाँगीर- 15सूबे (कांगङा को जीतकर लाहौर सूबे में मिलाया,जो पहले से ही एक सूबा था इस प्रकार इनकी संख्या पूर्ववत् 15 रही।)

3. शाहजहां- इसके समय में 18 सूबे थे। 3 सूबे (कश्मीर,थट्टा और उङीसा)जो अकबर के समय में क्रमशःलाहौर,मुल्तान एवं बंगाल सूबों में सम्मिलित थे) को स्वतंत्र सूबा बनाया।

4. औरंगजेब- इसके समय में 20 अथवा 21 सूबे थे। इनके अलावा 2सूबे ( बीजापुर-1686 में बना तथा गोलकुंडा 1687 में बना) नोट- औरंगजेब के काल में सूबों की संख्या 20 थी इसका उल्लेख डॉ. हरिश्चंद्र वर्मा तथा डॉ एल.पी.शर्मा ने किया है। किन्तु दत्ता,राय चौधरी एवं मजूमदार तथा बी.के.अग्निहोत्री ने क्षेत्र को भी सूबे के रूप में वर्णित किया है।(अर्थात् 14 सूबे उत्तर भारत में , 16सूबे दक्षिण भारत में तथा 1 सूबा अफगानिस्तान में था। उत्तर भारत के सूबे(14)- आगरा, दिल्ली, इलाहाबाद, अबध, अजमेर, गुजरात, बिहार, बंगाल, काबुल, लाहौर, मुल्तान और मालवा, कश्मीर, उङीसा, थट्टा(सिंध)।

दक्षिण भारत के सूबे(6)- खानदेश, बरार, अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुंडा तथा शंभाजी द्वारा अधिगृहीत क्षेत्र।

अफगानिस्तान का क्षेत्र(1)- सूबा।

अकबर के काल में केवल 4ही मंत्रिपरिषद होती थी-

  • वकील,
  • दीवान या वजीर,
  • मीर बख्शी,
  • सद्र-उस-सुदूर।

मीर-ए-सांमा पद अकबर के समय में ही स्थापित हुआ किन्तु यह मंत्री पद नहीं था,किन्तु बाद में मंत्री पद बन गया और इतना महत्वपूर्ण हो गया कि इसे वजीर पद प्राप्त करने की अंतिम सीमा माना जाने लगा।

मुगलकालीन चित्रकला

मुगलकालीन चित्रकला और प्रमुख चित्रकार : चित्रकला के क्षेत्र में मुगलो का विशिष्ट योगदान था। उन्होंने राज दरबार, शिकार दृश्य से सम्बन्धित नये चित्रों को आरंभ किया तथा नये रंगों और आकारों की शुरूआत की। भारत के रंगों जैसे फिरोजी रंग व भारतीय लाल रंग का इस्तेमाल होने लगा। ईरानी शैली का सपाट प्रभाव का स्थान भारतीय शैली के वृत्ताकार प्रभाव ने ले लिया, जिससे चित्रों में त्रिविनितयी प्रभाव आ गया।

अकबर के काल में पुर्तगाली पादरियों द्वारा राजदरबार में यूरोपीय चित्रकला भी आरंभ हुई। इससे प्रभावित होकर वह विशेष शैली अपनाई गई जिससे चित्रों मे करीब तथा दूरी का स्पष्ट बोध होता था। मुगल शैली में मनुष्यों का चित्र बनाते समय एक ही चित्र मे विभिन्न चित्रकारों द्वारा मुख, शरीर तथा पैरों को चित्रित करने का रिवाज था। शिकार, युद्ध के दृश्यों को चित्रित करने के अलावा जहांगीर काल में मनुष्यों तथा जानवरों के चित्रों को बनाने की कला में विशेष प्रगति हुई। चित्रकार – मीर सैय्यद अली, ख्वाजा अब्दुसम्मद, बसावन, लाल, केसू, मुकुन्द, दसवंत, अनुंल हसन, मंसूर, बिशनदास, मनोहर इत्यादि।

बाबर

चूंकि, बाबर का भारत में शासन काल अल्पकालीन था, इसलिए वह चित्रकला के क्षेत्र में कुछ अधिक नहीं कर सका। बिहजाद, बाबर के समय का महत्त्वपूर्ण चित्रकार था। बिहजाद को ‘ पूर्व का राफेल ’ कहा जा सकता है। तैमूरी चित्रकला शैली का चरमोत्कर्ष पर ले जाने का श्रेय बिहजाद को जाता है।

हुमायूं

हुमायूं ने फारस एवं अफगानिस्तान के अपने निर्वासन के दौरान मुगल चित्रकला की नींव रखी। फारस में ही हुमायूं की मुलाकात- मीर सैय्यद अली एवं ख्वाजा अब्दुस्समद से हुई। जिन्होंने मुगल चित्रकला का शुभारंभ किया।

मीर सैय्यद अली हेरात के प्रसिद्ध चित्रकार बिहजाद का शिष्य था। अब्दुस्समद ने जो कृतियां तैयार की उसमें से कुछ जहांगीर द्वारा तैयार की गई – गुलशन चित्रावली में संकलित है। हुमायूं की अस्थायी राजधानी काबुल में अब्दुस्समद द्वारा बनाई गई। मीर सैय्यद अली को हुमायूं ने ‘ नादिर उल अस्र ’ एवं अब्दुस्समद को ‘ शीरी कलम’ की उपाधि प्रदान की थी। हुमायूं ने इन दोनों को ‘ दास्ताने-आमिर- हम्जा’ की चित्रकारी का कार्य सौंपा। दास्ताने-अमीर-हम्जा – हम्जानामा हम्जानामा मुगल चित्रशाला की प्रथम महत्त्वपूर्ण कृति है। यह हजरत पैगम्बर के चाचा अमीर हम्जा के वीरतापूर्ण कारनामों का चित्रणीय संग्रह है। इसकी शुरूआत हुमायूं के समय हुई तथा पूर्ण अकबर के समय हुई। मीर सैय्यद अली को पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया था। इसमें कुल 1200 चित्रों का संग्रह है। मुल्ला अलाउद्दीन कजवीनी ने अपने ग्रंथ -‘ नफाइसुल मासिर ’ में हम्जनामा को ‘हुमायूं के मस्तिष्क’ की उपज बताया है।

अकबर

अकबर के समय के प्रमुख चित्रकार मीर सैय्यद अली, ख्वाजा अब्दुस्समद, दसवंत, बसावन, जगन्नाथ, मुकुंद, फारुख कलम, केशव, माधव, महेश आदि थे। अबुल फजल ने आइन-ए-अकबरी में अकबर के दरबार में कुल 17 चित्रकारों का उल्लेख किया। बसावन, अकबर के समय का प्रमुख चित्रकार था। बसावन को चित्रकला के सभी क्षेत्रों में रेखांकन, रंगों के प्रयोग, छवि चित्रकारी, भू-दृश्यों का चित्रण आदि में महारत प्राप्त था। बसावन की सर्वोत्कृष्ट कृति है- एक कृशकाय (दुबले-पतले) घोड़े के साथ एक मजनूं को निर्जन क्षेत्र में भटकता हुआ चित्र । दसवंत जोकि एक कहार का बेटा था, उसे अकबर ने अपने चित्रणशाला में उच्चकोटि (प्रथम अग्रणी चित्रकार) का स्थान दिया।बाद में इसी दसवंत ने 1584 ई. में आत्महत्या कर ली थी। दसवंत द्वारा बनाए गए चित्र ‘रज्मनामा’ नामक पांडुलिपि में मिलते हैं। अब्दुस्समद के राजदरबारी पुत्र मुहम्मद शरीफ ने रज्मनामा के चित्रण कार्य का पर्यवेक्षण किया था। इसकी दो अन्य कृतियां हैं – ‘खानदाने तैमूरिया’ एवं ‘तूतीनामा’ ।‘रज्मनामा’ पांडुलिपि को ‘मुगल चित्रकला के इतिहास में एक मील का पत्थर’ माना जाता है। अकबर के समय में पहली बार ‘ भित्ति चित्रकारी’ की शुरूआत हुई।

जहांगीर

जहांगीर के समय को चित्रकला का ‘स्वर्णकाल’ कहा जाता है। उसने हेरात के ‘आकारिजा’ के नेतृत्व में आगरा में एक ‘चित्रशाला’ की स्थापना की। जहांगीर ने हस्तलिखित ग्रंथों की विषयवस्तु को चित्रकारी के लिए प्रयोग करने की पद्धति को समाप्त किया और इसके स्थान पर छवि चित्रों, प्राकृतिक दृश्यों आदि के प्रयोग को अपनाया। जहांगीर के समय के प्रमुख चित्रकारों में बिशनदास, उस्ताद मंसूर, अबुल हसन, मनोहर, फारूख वेग, दौलत आदि थे। जहांगीर के समय के प्रमुख चित्रकारी के क्षेत्र में घटी महत्त्वपूर्ण घटना थी, मुगल चित्रकला की पारसी प्रभाव से मुक्ति। मुगल चित्रकारी में यूरोपीय कला का प्रभाव अकबर के समय से शुरू हो गया था, लेकिन जहांगीर और शाहजहां के समय इसका विशेष इस्तेमाल किया गया। अबुल हसन बादशाह का प्रिय चित्रकार था, उसे जहांगीर ने ‘ नादिर-उल-जमा  की उपाधि दी थी।

अबुल हसन ने जहांगीर के गद्दी पर आसीन होने का एक चित्र तैयार किया था जिसे बाद में जहांगीर की आत्मकथा ‘ तुजुक-ए-जहांगीरी ’ के मुख्य पृष्ठ पर लगा दिया गया था।

‘चिनार के पेड पर असंख्य गिलहरियां बैठी हैं’ का चित्र अबुल हसन ने बनाया था।

बिशनदास को, जो छवि चित्रण में माहिर था, जहांगीर ने फारस के शाह अब्बास और उसके परिवार का छवि चित्र बनाने के लिए फारस भेजा था।

उस्ताद मंसूर को, जो प्राकृतिक दृश्यों तथा पशु-पक्षियों के चित्रण में माहिर था, जहांगीर ने ‘नादिर-उल-अस्र’ की उपाधि से नवाजा था। उस्ताद मंसूर ने ‘साइबेरिया का सारस’ एवं ‘बंगाल का एक फूल’ के चित्र बनाए थे।

जहांगीर के निर्देश पर चित्रकार दौलत ने अपने साथी चित्रकार बिशनदास, गोवर्धन एवं अबुल हसन एवं अबुल हसन के छवि चित्र एवं स्वयं अपना एक छवि चित्र बनाया। बिशनदास, मनोहर छवि चित्रों के निर्माण में सिद्धहस्त थे। जहांगीर कालीन एक प्रसिद्ध चित्रकार मनोहर का नाम तुजुके-जहांगीरी में नहीं मिलता है। जहांगीर ने अपने अग्रणी चित्रकार बिसनदास को अपने दूत खान आलम के साथ फारस के साथ फारस के शाह के दरबार में चित्र बनाकर लाने के लिए भेजा था। उसने शाह, उसके अमीरों तथा उनके परिजनों के अनेक छवि चित्र बनाकर लाया था। लन्दन की एक लाइब्रेरी में एक अद्भुत चित्र के लिए चित्र उपलब्ध है, जिसमें ‘एक चिनार के पेड़ पर असंख्य गिलहरियां अनेक प्रकार की मुद्राओं मं चित्रित है।’ यह चित्र संभवतः अबुल हसन का माना जाता है किंतु पृष्ठ भाग पर अंकित नामों से इसे मंसूर एवं अबुल हसन की संयुक्त कृति माना जाता है। फारुख बेग ने जहांगीर के समय बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह का चित्र बनाया था। दौलत फारुख बेग का शिष्य था। उसने बादशाह जहांगीर के कहने पर अपने साथी चित्रकारों – बिसनदास, गोवर्धन और अबुल हसन आदि का सामूहिक चित्र बनाया, साथ ही अपना भी एक छवि चित्र बनाया था।

शाहजहां

शाहजहां के समय आकृति-चित्रण और रंग सामंजस्य मे कमी आ गई थी। उसके काल में रेखांकन और बार्डर बनाने में उन्नति हुई। शाहजहां को दैवी प्रतीकों वाली अपनी तस्वीर बनवाने का शौक था, जैसे उसके सिर के पीछे रोशनी का गोला। प्रमुख चित्रकार – अनूप, मीर हाशिम, मुहम्मद फकीर उल्ला, मुरार, हुनर मुहम्मद नादिर, चिंतामणि। शाहजहां का एक विख्यात चित्र भारतीय संग्रहालय में उपलब्ध है, जिसमें शाहजहां को सूफी नृत्य करते हुए दिखाया गया है। उमेद ने अपनी कृति ‘मुश वा गोर्वेद’ में पशु-पक्षियों के पालन-पोषण को दिखाया है। ‘बूस्ता’ और ‘गुलिस्ता’ नामक ग्रंथ भी इसी के समय चित्रित किए गए थे।

औरंगजेब

औरंगजेब ने चित्रकला को इस्लाम के विरुद्ध मानकर बन्द करवा दिया था। किन्तु उसके शासनकाल के अंतिम वर्षों में उसने चित्रकारी में कुछ रूचि ली जिसके परिणामस्वरूप उसके कुछ लघु-चित्र शिकार खेलते हुए, दरबार लगाते हुए तथा युद्ध करते हुए प्राप्त होते हैं। औरंगजेब के बाद मुगल चित्रकार अन्यत्र जाकर बस गये, जहां पर अनेक क्षेत्रीय चित्रकला शैलियों का विकास हुआ। मनूची ने लिखा है कि ‘औरंगजेब की आज्ञा से अकबर के मकबरे वाले चित्रों को चूने से पोत दिया गया था।’ अकबर ने चित्रकला की प्रशंसा करते हुए कहा है कि ‘चित्रकार के पास ईश्वर को पहचानने का एक विचित्र साधन होता है।’जहांगीर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुके-जहांगीरी’ में लिखा है कि -‘कोई भी चित्र चाहे वह किसी मृतक व्यक्ति द्वारा बनाया गया हो या फिर जीवित व्यक्ति द्वारा, मैं देखते ही यह तुरन्त बता सकता हूं कि यह किस चित्रकार की कृति है। यदि कोई सामूहिक चित्र है तो मैं उनके चेहरे पृथक-पृथक कर यह बता सकता हूं कि प्रत्येक अंग किस चित्रकार ने बनाया है।’पर्सी ब्राउन -‘जहांगीर के साथ ही मुगल चित्रकला की वास्तविक आत्मा पतनोन्मुख हो गयी’

मुगलकालीन स्थापत्य कला

मुगलकालीन स्थापत्य,कला एवं संस्कृति : मुगलकाल को उसकी बहुमुखी सांस्कृतिक गतिविधियों के कारण भारतीय इतिहास का द्वितीय क्लासिकी युग (Second Classical Age) कहा गया है। मुगल कालीन स्थापत्य मध्य एशिया की इस्लामी और भारतीय कला का मिश्रित रूप है, जिसमें फारस,मध्य एशिया, तुर्की , गुजरात, बंगाल एवं जौनपुर आदि स्थानों की परंपराओं का अद्भुत मिश्रण मिलता है। मुगलकालीन स्थापत्य की मुख्यतम विशेषता :  संगमरमर के पत्थरों पर हीरे-जवाहरात से की गयी जङावट पित्रादुरा () एवं महलों तथा विलास भवनों में बहते पानी का उपयोग है।

बाबर के समय में स्थापत्य कला : मुगलकालीन स्थापत्य काल की शुरुआत बाबर के समय से होती है, उसने पानीपत के निकट काबुली-बाग में एक मस्जिद (1529ई.) में बनवायी। इसके अतिरिक्त बाबर ने रूहेलखंड में संभल की जामी मस्जिद तथा आगरा में लोदी किले के भीतर एक मस्जिद बनवायी । एवं ज्यामितीय विधि पर आधारित एक उद्यान आगरा में लगवाया।जिसे नूर अफगान नाम दिया गया।

हुमायूँ के समय में स्थापत्य कला : हुमायूँ ने 1533ई. में दिल्ली में दीनपनाह (विश्व का शरण स्थल) नामक एक नगर का निर्माण करवाया।जो आज पुराने किले के नाम से विख्यात है।इसके अतिरिक्त हुमायूँ ने हिसार जिले में फतेहबाद नामक स्थान पर फारसी शैली में एक मस्जिद का निर्माण करवाया।

शेरशाह : शेरशाह ने दिल्ली पर अधिकार करने के बाद शेरगढ य़ा दिल्ली शेरशाही नामक नये नगर की नींव डाली।यद्यपि इसके अवशेषों के रूप में अब लाल दरवाजा और खूनी दरवाजा ही देखने को मिलता है। 1542ई. में शेरशाह ने दिल्ली के पुराने किले के अंदर किला-ए-कुहना नामक मस्जिद का निर्माण करवाया और उसी परिसर में शेर मंडल नामक एक अष्टभुजाकार तीन मंजिला मंडप का निर्माण करवाया। किन्तु शेरशाह की सबसे महत्वपूर्ण कृति बिहार के सासाराम (आधुनिक रोहतास जिला ) नामक स्थान पर झील के बीच मे ंएक ऊँचे चबूतरे पर स्थित उसका मकबरा है। जिसमें भारतीय एवं इस्लामी निर्माण कला का अद्भुत सम्मिश्रण देखने को मिलता है।

अकबर कालीन इमारतें : अकबर के शासन काल में बनी पहली इमारत दिल्ली में बना हुमायूँ का मकबरा है।यद्यपि इसके निर्माण में उसका कोई हाथ नहीं था। हुमायूँ का मकबरा यह मकबरा ज्यामितीय चतुर्भुज आकार के बने उद्यान के मध्य एक ऊँचे चबूतरे पर स्थित है।यह चार-बाग पद्धति में बना प्रथम स्थापत्य स्मारक था।

हुमायूँ के मकबरे का निर्माण 1565ई. में हुमायूँ की विधवा बेगा बेगम ( हाजी बेगम ) ने शुरू करवाया। दोहरी गुंबद वाला यह भारत का पहला मकबरा है। चार-बाग पद्धति का प्रयोग पहली बार हुमायूँ के मकबरे से हुआ वैसे भारत में पहला बाग युक्त मकबरा सिकंदर लोदी का मकबरा था। इस मकबरे को ताजमहल का पूर्वगामी माना जाता है। हुमायूँ के मकबरे में दफनाये गये मुगल घरानों के लोग इस प्रकार हैं : बेगाबेगम, हमीदाबानू बेगम, हुमायूँ की छोटी बेगम, दारा शिकोह, जहांदारशाह, फर्रुखशियर, रफीउरद्दरजात, रफीउद्दौला और आलमगीर द्वितीय । दिल्ली के अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर और उसके तीन शहजादों को अंग्रेज

लेफ्टीनेंट हड्सन ने 1857ई. में हुमायूँ के मकबरे से गिरफ्तार किया था। इस मकबरे का निर्माण अकबर की सौतेली माँ हाजी बेगम ने फारसी वास्तुकार मीरक मिर्जा गयास की देख-रेख में करवाया था। इस मकबरे की विशेषता- संगमरमर से निर्मित इसका विशाल गुंबद एवं द्विगुंबदीय प्रणाली थी। यह मुगलकालीन एकमात्र मकबरा है जिसमें मुगलवंश के सर्वाधिक लोग दफनाये गये हैं। इस मकबरे को ताजमहल का पूर्वगामी कहा गया है। अकबर कालीन इमारतों में मेहराबी और शहतीरी शैली का समान अनुपात में प्रयोग मिलता है। अकबर के काल में फारसी शैली का हिन्दू एवं बौद्ध शैलियों के साथ सम्मिश्रण हुआ। अकबर की अधिकांस इमारतों में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग मिलता है। अकबर कालीन इमारतों को सुविधानुसार दो भागों में बाँटा जा सकता है।

आगरा में निर्मित इमारतें : अकबर कालीन आगरे में बनी इमारतों में बहुत थोङी बची हुई हैं जिनमें अकबरी महल और जहांगीरी महल प्रमुख हैं। अकबर ने (1565-73ई.) अपनी राजधानी आगरा में एक किला बनवाया। आगरे के दुर्ग में निर्मित जहाँगीरी महल की नकल ग्वालियर के मानसिंह महल से ली गयी है। इस महल में हिन्दू और इस्लामी परंपराओं का समावेश मिलता है। अकबरकालीन इमारतों में गुंबदों के प्रयोग से बचने का प्रयास किया गया है।

अकबर कालीन फतेहपुर सीकरी में निर्मित इमारतें : अकबर ने 1570-71ई. में फतेहपुर सीकरी को अपनी राजधानी बनाया और वहाँ पर अनेक भवनों का निर्माण करवाया। जिन्हें दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है

  1. धार्मिक
  2. लौकिक

फतेहपुर सीकरी के भवनों की मुख्य विशेषता- चापाकार एवं धरणिक शैलियों का समन्वय है। दीवाने आम और दीवाने खास लौकिक प्रयोग के लिये बनाये गये थे।दीवाने आम एक आयताकार प्रांगण था। इसी में बादशाह का सिंहासन रखा रहता था। इसकी मुख्य विशेषता –खंभे पर निकली हुई बरामदे की छत थी। दीवाने खास एक घनाकार आयोजन था। इसके निर्माण में बौद्ध एवं हिन्दू वास्तुकला की झलक मिलती है। राजपूत रानी जोधाबाई का महल फतेहपुर सीकरी का सबसे बङा महल था । इस पर उत्कीर्ण अलंकरणों की प्रेरणा दक्षिण के मंदिरों की वास्तुकला से ली गई है। इस पर गुजराती शैली का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है।यह फतेहपुर सीकरी का सर्वोत्तम महल है।

पंचमहल या हवामहल : यह पिरामिड के आकार का पाँच मंजिला महल था।यह नालंदा के बौद्ध विहारों की प्रेरणा पर आधारित था।

जामा मस्जिद : फतेहपुर सीकरी की सबसे प्रभावोत्पादक इमारत थी। इसे फतेहपुर का गौरव कहा जाता था।संगमरमर की निर्मित इस मस्जिद को फर्ग्युसन ने पत्थर में रूमानी कथा के रूप में प्रशंसित किया है।

अपनी गुजरात विजय की स्मृति में अकबर ने इस मस्जिद (जामा मस्जिद) के दक्षिणी द्वार पर 134फीट ऊँचा एक बुलंद दरवाजा बनवाया । जिसके निर्माण में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया है।यह ईरान से ली गयी अर्द्ध – गुंबदीय शैली में बना है। 1585ई. में अकबर फतेहपुर सीकरी के स्थान पर लाहौर में निवास करने लगा और वहाँ पर उसने लाहौर के किले का निर्माण करवाया। अबुलफजल ने अकबर की स्थापत्य कला में अभिरुचि की प्रशंसा करते हुए कहा है कि – उसने आलीशान इमारतों की योजना बनाई तथा अपने मस्तिष्क एवं ह्रदय की रचना को पत्थर एवं मिट्टी की पोशाक पहनाई। इसके अतिरिक्त अकबर ने अनेक इमारतों का निर्माण करवाया जिसमें – तुर्की-सुल्ताना का महल, खास महल, मरियम-महल, बीरबल महल आदि प्रमुख हैं। मरियम महल से मुगल चित्रकारी के विषय में जानकारी मिलती है।

तुर्कीसुल्ताना का महल : इतना सुंदर था कि पर्सी ब्राउन ने उसे स्थापत्य कला का मोती कहा है। फर्ग्युसन ने ठीक ही कहा है कि- फतेहपुर सीकरी किसी महान व्यक्ति के मस्तिष्क का प्रतिबिम्ब है।

जहाँगीर के समय में स्थापत्य कला :  जहाँगीर ने वास्तुकला की अपेक्षा चित्रकला को अधिक प्रश्रय दिया। फलस्वरूप उसके समय में बहुत ही कम इमारतों का निर्माण हुआ। आगरा के पास सिकंदरा में स्थित अकबर का मकबरा (जिसके निर्माण की योजना अकबर ने बनायी थी किन्तु निर्माण जहाँगीर ने 1613ई. में करवाया था।इस पाँच मंजिले पिरामिड के आकार के मकबरे की सबसे ऊपरी मंजिल पूर्णतः संगमरमर की बनी है। इस मकबरे की उल्लेखनीय विशेषता – इसका गुंबद -विहीन होना तथा बलुआ पत्थर से बना मकबरे का दरवाजा एवं संगमरमरकी बनी चार सुंदर मीनारें हैं। जो इससे पूर्व देखने को नहीं मिलती है।यह पूरा मकबरा एक सुव्यवस्थित उद्यान के बीच विशाल चबूतरे पर स्थित है।

जहाँगीर के समय की सबसे उल्लेखनीय इमारत : आगरा में बना ऐतमादुद्दौला का मकबरा है।यह चतुर्भुजाकार मकबरा बेदाग सफेद संगमरमर का बना ऐसा पहला मकबरा है, जिसमें बङे पैमाने पर संगमरमर का प्रयोग किया गाय है, तथा अलंकरण के लिए इस्लामिक भवनों में पहली बार- पित्रा -दुरा (फूलों वाली आकृतियों में कीमती पत्थरों एवं बहुमूल्य रत्नों की जङावट) का प्रयोग मिलता है। यद्यपि इस प्रणाली ( पित्रा-दुरा) का प्रयोग इससे पूर्व ही उदयपुर (राजस्थान) के गोल मंडल में 1600ई. में किया जा चुका था। जहाँगीर के शासन काल की अन्य इमारत लाहौर में रावी नदी के तट पर स्थित शहादरा में बना उसका मकबरा है। जिसके अधिकांश भाग का निर्माण जहाँगीर की मृत्यु के बाद नूरजहाँ ने करवाया था।

जहाँगीर के शासन काल के अंतिम या शाहजहाँ के शासन काल के प्रारंभिक दिनों में निर्मित दिल्ली में अब्दुर्रहीम खानखाना का मकबरा जो न्यूनाधिक रूप से हूमायँ के मकबरे की प्रतिकृति है पर कुछ मामलों में इससे ताजमहल का पूर्वाआभास होता है। जहाँगीर ने कश्मीर में प्रसिद्ध शालीमार बाग की स्थापना की और उसी ने शेख सलीम चिश्ती के मकबरे में लाल बलुआ पत्थऱ के स्थान पर संगमरमर लगवाया था।

शाहजहाँ के समय में स्थापत्य कला : शाहजहाँ का काल मुगल वास्तुकला का स्वर्ण युग माना जाता है।इसके अतिरिक्त यह काल संगमरमर के प्रयोग का चरमोत्कर्ष काल माना जाता है। इस कला में संगमरमर जोधपुर के मकराना नामक स्थान से मिलता था,जो वृत्ताकार कटाई के लिए अधिक उपयुक्त होता था। इस काल की प्रमुख विशेषताएँ – नक्काशी युक्त या पर्णिला मेहराबें तथा बंगाली शैली में मुङे हुए कंगूरे तथा जंगलें के खंभे आदि थी।

शाहजहाँ कालीन आगरे में निर्मित इमारतें : आर्शिवादी लाल श्रीवास्तव ने शाहजहाँ के शासन काल को वास्तुकला की दृष्टि से स्वर्ण काल कहा। आगरे के किले में स्थित दीवाने-आम (1627ई.) संगमरमर से बनी शाहजहाँ के काल की पहली इमारत थी। इसके अतिरिक्त दीने-खास (1637ई.) तथा मोती मस्जिद (1654ई.) संगमरमर से निर्मित अन्य प्रसिद्ध इमारतें थी। इसके अतिरिक्त शीश महल, खास महल,आगरे के किले में बने नगीना मस्जिद एवं मुसम्मन बुर्ज आदि पत्थरों से निर्मित अन्य प्रमुख इमारते हैं।

मोती मस्जिद अपनी पवित्रता एवं चारुता के लिए अत्यधिक प्रसिद्ध थी।यह आंगरे की सभी इमारतों में सबसे सुंदर और आकर्षक है। यह शुद्ध सफेद संगमरमर से निर्मित है। शाहजहाँ के काल की एक अन्य इमारत आगरे की जामी मस्जिद थी जिसे- मस्जिदे-जहाँनामा कहा जाता था।इसे शाहजहाँ की बङी पुत्री जहाँआरा ने बनवाया था। दिल्ली की इमारतें- 1638ई. में शाहजहाँ ने दिल्ली में यमुना नदी के किनारे अपनी नयी राजधानी शाहजहाँनाबाद का निर्माण प्रारंभ किया जा 1648ई. में जाकर पूरा हुआ। और इसी समय मुगल राजधानी दिल्ली स्थानांतरित हुई। शाहजहाँ ने अपनी नवीन राजधानी(1648ई.) दिल्ली (शाहजहाँनाबाद) में एक चतुर्भुज आकार का किला बनवाया। जो लाल-बलुआ पत्थर से निर्मित होने के कारण लाल-किले के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसका निर्माण कार्य 1648ई. में पूर्ण हुआ। 1करोङ की लागत से बनने वाला लाल किला हमीद अहमद नामक शिल्पकार की देखरेख में संपन्न हुआ। इस किले के पश्चिमी द्वार का नाम- लाहौरी दरवाजा एवं दक्षिणी द्वार का नाम दिल्ली-दरवाजा है। दिल्ली के किले में निर्मित दीवाने आाम की विशेषता थी इसके पीछे की दीवार में बना एक कोष्ठ -जहाँ विश्व प्रसिद्ध तख्ते-ताउस रखा जाता था। कोष्ठ में बने कुछ चित्रों पर यूरोपीय शिल्पकला का प्रभाव दिखता है।इसके अतिरिक्त दीवाने-आम में स्थित रंगमहल का जाली में न्याय की तराजू में भी यूरोपीय प्रभाव दिखाई देता है।कोष्ठ में बने कुछ चित्रों का विषय फ्लोरेंस नाइटिंगेल से संबंधित है। दीवाने-खास- दिल्ली के लाल किले में स्थित दीवाने-खास की एक विशेषता है-इसके अंदर की छत चाँदी की बनी है, तथा उस पर सोने,संगमरमर तथा बहुमूल्य पत्थर की मिली-जुली सजावट की गयी है। जो उस पर खुदे अभिलेख को चरितार्थ करती है-

अगर फिरदौस वर रूबी जमीं नस्त हमी अस्त । अर्थात् अगर दुनियाँ में कहीं स्वर्ग है तो यहीं है,यहीं है। ( अमीर खुसरो )

शाहजहाँ ने दिल्ली के लाल किले के पास जामा-मस्जिद (1648ई.) का निर्माण करवाया। इसमें शाहजहाँनी शैली में फूलदार अलंकरण की मेहराबें बनी है।

ताजमहल : शाहजहाँ कालीन वास्तुकला का चरम दृष्टांत आगरे में यमुना नदी के तट पर निर्मित उसकी प्रिय पत्नी मुमताज महल का मकबरा है।(ताजमहल) जो 22 वर्षों में 9करोङ की लागत से तैयार किया गया है।इसका मुख्य स्थापत्यकार- उस्ताद अहमद लाहौरी था, जिसे शाहजहाँ ने नादिर-उल-असरार की उपाधि प्रदान की थी।और इसका प्रधान मिस्री या निर्माता उस्ताद ईसा था। लेनपूल ने ताजमहल के बारे में लिखा है कि ताजमहल संगमरमर के रूप में वह स्वप्न है, जिसकी योजना ईश्वर ने तैयार की तथा निर्माण स्वर्णकारों ने किया। इसी प्रकार हावेल ने इसे – भारतीय नारीत्व की साकार प्रतिमा कहा है। उसने कहा है कि- यह एक ऐसा महान विचार है, जो स्थापत्य कला से नहीं, बल्कि मूर्तिकला से संबंधित है। ताजमहल में फारसी एवं भारतीय शैली का अद्भुत समन्वय मिलता है।ईसी कारण स्मिथ महोदय ने इसे- यूरोपीय एवं एशियाई प्रतिभा के सम्मिश्रण की उपज बताया है। यह मकबरा दिल्ली में स्थित हुमायूँ के मकबरे से प्रेरित था। औरंगजेब के समय में स्थापत्य कला- औरंगजेब को ललित कलाओं में कोई रुचि नहीं थी फिर भी उसके काल में कुछ इमारतें बनी। औरंगजेब कालीन प्रमुख इमारतों में दिल्ली के लाल किले में स्थित मोती मस्जिद (पूर्ण संगमरमर), लाहौर की बादशाही मस्जिद(1674ई.) तथा रबिया बीबी का मकबरा प्रमुख है। औरंगजेब ने अपनी प्रिय पत्नी रबिया दुर्रानी की याद में 1678ई. में औरंगाबाद में एक मकबरा बनवाया।जो बीबी का मकबरा नाम से प्रसिद्ध है। इसे दक्षिण का ताजमहल भी कहा जाता है।

जहांआरा की कब्र : यह कब्र शेख निजामुद्दीन औलिया के मकबरे के दक्षिण में जालीदार संगमरमर के परदों सहित एक बिना छत का घेरा है।इस कब्र के खोखले ऊपरी भाग पर घास रहती है। जहांआरा के मकबरे पर एक मर्मस्पर्शी लेख खुदा है जिसका अर्थ है- सिवाय हरी घास के मेरी कब्र को किसी भी चीज से न ढका जाए, क्योंकि केवल घास ही इस दीन की कब्र ढकने के लिए काफी है। हांआरा के मकबरे के समान एक छोटे अहाते में मुहम्मद शाह का मकबरा है।इसी अहाते में अकबर द्वितीय का पुत्र मिर्जा जहांगीर भी दफनाया गया है।

दरगाह कुतुब शाह  : ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी(कुतुब साहिब) की कब्र जो दिल्ली में स्थित है के पश्चिमी दीवार में औरंगजेब ने रंगीन टाइल जङवायी।इस कब्र के आस-पास का क्षेत्र कालांतर में कब्रिस्तान में परिवर्तित हो गया। कुतुब साहिब के अहाते में दफनाये गये प्रमुख लोगों में शामिल हैं- बहादुरशाह प्रथम(1707-12ई.), अकबर द्वितीय(1806-37ई.)। उल्लेखनीय बात यह है कि बहादुरशाह द्वितीय ने भी अपने लिये यहां कब्र बनवायी थी लेकिन रंगून निर्वासित हो जाने के कारण उनकी कब्र खाली ही पङी रही।

मूल्यांकन

मुगल शासन को भारत के राजनैतिक इतिहास की निरंतरता में देखने में है। हमारे इतिहासकारों के लिए मुस्लिम काल के किसी और शासक को गौरवमंडित करना आसान नहीं था। इसलिए उन्हांेने अकबर को महानता से मंडित करते हुए विदेशी मुगल शासन को अपवाद समझने की बजाए उसे भारत के राजनैतिक इतिहास की निरंतरता में दिखाने का प्रयत्न किया है।

यह सब जानते हैं कि भारत के इतिहास लेखन की पीठिका अंग्रेजों ने तैयार की थी। मुगल शासन भी उन्हीं की तरह का विदेशी शासन था। अंग्रेज इतिहासकार चाहते थे कि भारत के लोग मुगल काल को सकारात्मक दृष्टि से देखें। क्योंकि तभी वे ब्रिटिश शासन को भी सकारात्मक दृष्टि से देख सकंेगे। इससे उन्हें भारत के बौद्धिक वर्गों में अपने प्रभाव का विस्तार करने में सहायता मिलेगी। उनका यह उद्देश्य अधिकांशत: पूरा हुआ है। क्योंकि यह मान लिया गया है कि विदेशी होने के बावजूद मुगल और अंग्रेज भारत को प्रगति की दिशा में आगे बढ़ाने में सहायक हुए थे। यह कितनी विचित्र बात है कि मुस्लिम और ब्रिटिश शासन को सकारात्मक रूप से दिखाने का यह अभियान केवल एक शासक अकबर के महिमामंडन पर टिका हुआ है।

मुगलकाल और अकबर के शासन की समीक्षा करने से पहले यह देख लेना चाहिए कि इतिहास लेखन को इस दिशा में मोड़ने से हमारी क्या क्षति हुई है। मुस्लिम काल हमारे इतिहास का एक ऐसा मोड़ है जहां से हमारी अपनी राजनीतिक व्यवस्थाएं क्षीण होती गईं, और मुगलकाल ने उन पर दृढ़तापूर्वक इरानी और उस्मानी राज्य व्यवस्थाओं को थोप दिया। इस प्रतिरोपण ने ही अंग्रेजों को भारत पर अपनी व्यवस्थाएं लादने में सहायता पहुंचाई। मुसलमानों और अंग्रेजों के शासन का यह पूरा काल इस अर्थ में विदेशी नहीं है कि उस काल के शासक विदेशी थे। बल्कि वह इस गहरे अर्थ में विदेशी है कि उसने भारतीय राज-तंत्र को विदेशी राज-तंत्र में बदल दिया और समाज को अपनी नैतिक व्यवस्थाएं चलाने के लिए जिस कवच की आवश्यकता होती है, वह नष्ट हो गया। यह मामूली भूल नहीं है कि हमारे इतिहासकारों ने यह समझने का ठीक से प्रयत्न ही नहीं किया कि मुस्लिम काल में राजनैतिक ढांचे को किस तरह बदला गया और उसने समाज की व्यवस्थाओं को किस तरह क्षत-विक्षत किया।

मुस्लिम शासन ने कैसे हमें अपने राजनैतिक इतिहास से विच्छिन्न कर दिया, यह समझने के लिए यह याद करना आवश्यक है कि हमारी राज्य-व्यवस्था क्या थी। सबसे पहली बात यह कि भारत में समाज के सभी साधनों पर समाज का ही अधिकार था, राज्य का नहीं। लोग जो भी उत्पादित-अर्जित करते थे उसका एक भाग समाज की सभी व्यवस्थाओं को चलाने के लिए अलग कर लिया जाता था। यह विभाजन परंपरा से होता आ रहा था और समयानुसार उसमें कोई परिवर्तन सबकी सहमति से होता था। राज्य भी समाज की व्यवस्थाओं का एक हिस्सा था। उसका भाग उसे मिले यह दायित्व भी स्थानीय संस्थाओं का ही था, जिनकी प्रतिबद्धता जितनी राज्य से थी, उतनी ही समाज से भी थी। राज्य सैनिक अभियानों में लगे रहते थे, जिनका उद्देश्य गांधीजी के शब्दों में ‘शौर्य की परंपरा को बनाए रखना था। लेकिन उनका प्राथमिक दायित्व समाज के शील, समृद्धि और न्यायशीलता की रक्षा करना था। इस तरह राज्य समाज की व्यवस्थाओं का रक्षक था।

इस्लाम के उदय के कुछ समय बाद आठवीं शताब्दी में भारत पर भी मुस्लिम आक्रमण आरंभ हो गए थे। लेकिन अरब आक्रमणकारियों का उद्देश्य राजधानियों और मंदिरों के धन को लूट कर ले जाने से अधिक नहीं था। लगभग तीन शताब्दी तक भारतीय राजा छिटपुट पराजयों के बाद उन्हें खदेड़ते रहने में सफल रहे। मोहम्मद बिन कासिम को सिंध में पैर जमाने का मौका मिला, पर भारतीय राजाओं के प्रभाव का विस्तार भी बीच-बीच में सुदूर गांधार तक होता रहा। इस बीच तुर्क आए और उन्होंने अरबों से उनकी सत्ता छीन ली। उन्हीं ने भारत पर आक्रमण किए और 1192 में पृथ्वीराज चौहान की एक युद्ध में पराजय के बाद दिल्ली में मुस्लिम शासन की नींव पड़ गई। मुगलों के आने से पहले दिल्ली सल्तनत पर पांच राज्यवंशों का अधिकार रहा। 320 वर्ष की इस अवधि में 35 सुल्तान गद्दी पर बैठे जिनमें से19 की उत्तराधिकार की लड़ाई में हत्या हो गई। इन राजवंशों में सबसे कम खिलजी और सबसे अधिक तुगलक राजवंश का शासन रहा और ये दोनों राजवंश अपनी क्रूरता और उत्पीड़न के लिए अधिक प्रसिद्ध हुए। तुगलक वंश की नींव जिस गाजी मलिक ने रखी थी, उसका पिता तुर्क था और मां हिंदू। सत्ता में पहुंचकर उसने अपना नाम गियाजुद्दीन तुगलक रख लिया और गद्दी पर बैठते ही मुस्लिम किसानों का कर घटा दिया और हिंदू किसानों का कर बढ़ा दिया। यह वह काल था जब मध्य एशिया से अफगानिस्तान तक का सारा क्षेत्र, सैनिक अभियानों के लिए पेशेवर योद्धा प्रदान करने वाले क्षेत्र में बदल गया था। इन पेशेवर योद्धाओं का उद्देश्य लूटमार से समृद्ध होना तो था ही, इस्लाम ने उसे एक नया उद्देश्य भी दे दिया था – जेहाद। मुस्लिम शासन ही नहीं हर सैनिक अपने आप को गाजी समझता था और इस्लाम न मानने वालों का कत्लेआम उनके जीवन का दूसरा उद्देश्य हो गया था। इन दोनों उद्देश्यों ने मुस्लिम आक्रांताओं को कभी अपने अभियान के लिए सैनिकों की कमी नहीं होने दी। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इस्लाम की शक्ति के उदय ने यूरोप को भी झकझोर दिया था और दोनों के संघर्ष में युद्ध की नई सामग्री विकसित हो रही थी। तोपखाना और तोड़ीदार बंदूकें इस दौर के नये हथियार थे। जिन्हें पाकर मुस्लिम आक्रांताओं की शक्ति बढ़ गई थी। इन्हीं सब कारणों ने तुर्कों-मुगलों को अजेय बना दिया था और भारत इस काल चक्र में फंस गया था।

इस पृष्ठभूमि में मुगल शासन की नींव पड़ी। बाबर उज्बेक था और उसके पिता फरगाना के शासक थे। उनकी मृत्यु के समय बाबर अवयस्क था। इसलिए फरगाना की सत्ता पाते ही उसका विरोध शुरू हुआ और उसे वहां से खदेड़ दिया गया। बाबर उलुगबेग के शिशु उत्तराधिकारी की फौजों को हराकर काबुल का शासक बन बैठा। दिल्ली सल्तनत के निरंतर चलने वाले अंतसंघर्ष के कारण इब्राहिम लोदी से असंतुष्ट दौलत खां लोदी के निमंत्रण पर उसने दिल्ली पर आक्रमण किया। उसे वास्तविक सफलता तब मिली जब उसने अपने तोप खाने के बल पर उस समय के सबसे शक्तिशाली राजा संग्राम सिंह को हरा दिया।

बाबर के पिता तैमूर के वंशज थे और मां चंगेज। केवल वह ही नहीं बल्कि सभी मुगल सम्राट अपने को मुगल के बजाय तैमूरी कहलाना ही पसंद करते थे। तैमूर और चंगेज उस दौर के सबसे क्रूर योद्धा थे। तैमूर ने 1398 में दिल्ली विजय के बाद उसके एक लाख निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतरवा दिया था। इतिहासकारों का आकलन है कि तैमूर के आक्रमणों में 1.7 करोड़ लोगों की जानें गईं थी जो उस समय विश्व की जनसंख्या का 5 प्रतिशत था। तैमूर का वंशज होने के कारण मुगल शासकों को इरानी शासकों का सहयोग प्राप्त होता रहा। अकबर की आरंभिक सफलता शिया बैरम खां के कारण हुई। उसे पानीपत की लड़ाई में राजा हेमचंद्र के अचानक घायल हो जाने के कारण हारते-हारते सफलता हासिल हो गई थी। वास्तव में अकबर से ही भारत में मुगल शासन का आरंभ माना जाना चाहिए। उसके बाद 1707 तक लगभग डेढ़ शताब्दी तक मुगल शासन में स्थिरता रही। अकबर को अन्य सब मुस्लिम शासकों से अलग दिखाने के लिए यह कहा जाता है कि वह उदार था, दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णु था और उसने अपने विजय अभियान से भारत के अधिकांश क्षेत्रों को एक शासन में बांध दिया। हालांकि अचेत हेमचंद्र के साथ और चितौड़ विजय के बाद किले के 30 हजार निशस्त्र लोगों के साथ उसने जो किया उससे उसकी वही छवि उभरती है जो सभी मुस्लिम शासकों की छवि थी- गाजी की छवि। लेकिन बाद में उसके व्यक्तित्व में उदारता और सहिष्णुता के लक्षण भी मिलते हैं। राजपूतों से हाथ मिलाना उसके राजनैतिक कौशल का परिचायक था, क्योंकि वे उस समय की एक बड़ी शक्ति थे। वह स्वभाव से कट्टर नहीं था और उसकी बहादुरी और उदारता के बहुत से किस्से उसे अन्य मुस्लिम शासकों से अलग सिद्ध करते हैं। लेकिन उसके नेतृत्व में जिस शासन की नींव पड़ी वह एक विदेशी शासन ही था, भारतीय शासन नहीं।

अकबर को 49 वर्ष शासन करने का अवसर मिला। औरंगजेब को छोड़कर किसी और शासक को इतना लंबा समय नहीं मिला। लेकिन अन्य सब शासकों की तरह इन दोनों का समूचा शासन काल भी युद्ध करते ही बीता। इतिहासकार शेरशाह सूरी को उसके पांच वर्ष के शासन में ही राजस्व व्यवस्था सुदृढ़ करने और अकबर को मनसबदारी स्थापित करने का श्रेय देते हैं। लेकिन यह दोनों व्यवस्थाएं भारत में एक औपनिवेशिक सत्ता स्थापित करने वाली व्यवस्थाएं ही थीं। इतिहासकारों ने यह तथ्य भुला दिया है कि मुस्लिम काल सैनिक शासन का काल है। अकबर की मनसबदारी उसी सैनिक शासन को औपचारिक स्वरूप देकर और मजबूत बनाने वाली थी। इसके साथ ही सारे राजस्व पर केंद्रीय सत्ता का नियंत्रण हो गया था और सुल्तान राजस्व की अधिकांश वसूली सीधे करने लगे थे। इस तरह स्थानीय व्यवस्थाओं को चलाने के लिए राजस्व का जो भाग अलग कर लिया जाता था उसे भी हड़प लिया गया। राज सत्ता का उपयोग सैनिक अभियान के अलावा धर्मांतरण और मस्जिदें, मकबरें बनवाने में हुआ, राजधर्म निभाने में नहीं।

अकबर की मनसबदारी में इरानी और तूरानी लोगों की भरमार थी। मंत्रिमंडल में जहां इरानी अधिक थे, वहीं मनसबदारी में उज्बेकों का दबदबा था। गिनती के राजपूतों को छोड़कर सभी मनसबदार मुस्लिम थे जिनमें 87 प्रतिशत विदेशी थे। पैदल सेना में कुछ स्थानीय भर्ती के अलावा सेना में सब जगह विदेशी लोगों की ही भर्ती होती थी। इस रूप में मुस्लिम काल ने भारत को निशस्त्र कर दिया था। राजस्व के केंद्रीकरण से मुस्लिम शासकों को बड़ी सेनाएं रखने की सुविधा मिल गई थी। बाहर से निरंतर आने वाले प्रशासकों और योद्धाओं ने भारतीयों में से नया नेतृत्व उभरने के रास्ते बंद कर दिए थे।

इस तरह स्पष्ट है कि मुस्लिम शासन के आरंभ में स्वशासन की भारतीय व्यवस्था को सैनिक शासन की केंद्रीय व्यवस्था में बदल दिया गया था। ऐसे शासन से साधारण लोगों को कोई अपेक्षा नहीं हो सकती थी। किसानों की आधी उपज सुल्तान की घोषित की गई। लेकिन राजस्व की वसूली की सारी मशीनरी बाहरी और विदेशी थी, इसलिए जबरन कहीं अधिक वसूली होती थी। न्याय की पंचायती व्यवस्था निर्जीव हो गई थी और बहुसंख्यक हिंदुओं के उत्पीड़न को रोकने की किसी से आशा नहीं की जा सकती थी। यह अराजकता की स्थिति थी जिससे केवल वे क्षेत्र बचे रहे जहां स्थानीय हिंदू शासक थे। राजपूतों, मराठों, बुंदेलों, दक्षिण के हिंदू राजाओं या मुगल निंयत्रण से बचे रहे पहाड़ी राजाओं के क्षेत्र ही इस अराजकता से बचे थे। यह अराजकता अंग्रेजी राज तक तो चली ही, कलेक्टर राज के रूप में आज भी कायम है। आज भी देश की अधिकांश आबादी के लिए शासन का अर्थ पुलिस के बल पर चलने वाला कलेक्टर राज ही है। इसकी नींव अंग्रेजों से भी पहले अकबर के शासन काल में पड़ गई थी, क्योंकि मनसबदारी के द्वारा सारा शासन बाहरी हाथों में चला गया था। जब तक हम अपने इतिहास को इस रूप में नहीं समझते, हम यह नहीं देख पाएंगे कि 13वीं शताब्दी से जो विदेशी शासन आरंभ हुआ उसने हमको अपने इतिहास से विच्छिन्न कर दिया और इस तरह के विदेशी शासकों में महानता नहीं देखी जाती।

Mr. Pratapsinh Ranaji Venziya
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Mr. Pratapsinh Ranaji Venziya Ph.D. Scholar In History (M.A., M.Phil.) Address : 9-160-1-K, Rajput Vas, N'r Hinglaj Temple Wav - 385575

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